लाइट बंद, जुगनू ऑन अंधेरे में चमकता जीवन : विलुप्त नहीं पर संकट में

संजय कुमार / अँधेरे होते ही घर आँगन, बाग़-बगीचा में एक फतिंगा प्रकाश छोड़ता उड़ता दिखता है। प्रकाश लगातार नहीं जलता है, बल्कि जलता बुझता टिमटिमाता रहता है। इसलिए इसे जुगनू कहते है। जुगनू कीट नहीं बल्कि  भृंग (बीटल) परिवार (लैम्पाइरिडी) का  है। दुनिया में इसके 2000 प्रजातियाँ हैं। इसे शीशे के छोटे बोतल में…

संजय कुमार / अँधेरे होते ही घर आँगन, बाग़-बगीचा में एक फतिंगा प्रकाश छोड़ता उड़ता दिखता है। प्रकाश लगातार नहीं जलता है, बल्कि जलता बुझता टिमटिमाता रहता है। इसलिए इसे जुगनू कहते है। जुगनू कीट नहीं बल्कि  भृंग (बीटल) परिवार (लैम्पाइरिडी) का  है। दुनिया में इसके 2000 प्रजातियाँ हैं। इसे शीशे के छोटे बोतल में पकड कर बंद करते कईयों का बचपन गुजरा होगा। लेकिन, अब यह कम हो गया है। हालाँकि यह विलुप्त’ नहीं है, परन्तु संकट में है, क्यों कि जिस संख्या में पहले दिखती थी अब नहीं दिखती है।

जुगनू के संरक्षण को लेकर हर साल जुलाई के पहले सप्ताहांत (शनिवार और रविवार) को विश्व जुगनू दिवस  पर मनाया जाता है। इसके मद्देनजर 4 और 5 जुलाई को भारत सहित विश्वभर में जुगनू से लोग रूबरू हुए,जागरूकता अभियान चलाया। और, अच्छी खबर यह है कि सारी जुगनू खत्म नहीं हुईं हैं। यूएस में बिग डिपर जैसी कुछ प्रजातियाँ अभी भी हर जगह मिलती हैं। हालाँकि, आईयूसीएन की लाल सूचि में  अब तक 150 प्रजातियों का आंकलन हुआ है, उनमें 20 प्रतिशत खतरे में हैं। आंकड़ों के अनुदार यूएस-कनाडा में 132 प्रजातियों में से 18 गंभीर रूप से लुप्तप्राय है, 10 संकटग्रस्त हैं, 7 असुरक्षितहैं। यानी 1/3 प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में है।

जुगनू  की आबादी और उनके अस्तित्व को लेकर हाल के वर्षों में पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों के बीच चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। सोशल मीडिया और वैज्ञानिक गलियारों में इस बात की गंभीर चर्चा है कि जुगनू तेजी से विलुप्त हो रहे हैं। वैज्ञानिकों के दावे के अनुसार, जुगनू पूरी तरह से गायब नहीं हो रहे हैं, लेकिन उनकी आबादी और प्रजातियों की विविधता में  भारी गिरावट  देखी जा रही है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) के विशेषज्ञों के मुताबिक, दुनिया भर में जुगनू की 2,000 से अधिक प्रजातियां हैं। उदाहरण के लिए, उत्तरी अमेरिका में मूल्यांकित की गई प्रजातियों में से लगभग 14 प्रतिशत  से 20 प्रतिशत प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर  हैं। कुछ प्रजातियों को ‘गंभीर रूप से लुप्तप्राय’ भी घोषित किया गया है। जुगनू की आधी से अधिक प्रजातियों के बारे में वैज्ञानिकों के पास पर्याप्त आंकड़ा नहीं है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछले 200 वर्षों में कई ऐसी प्रजातियां हैं जो पहले दर्ज थीं लेकिन अब दिखाई नहीं दी हैं। जुगनुओं के गायब होने के पीछे इंसानी गतिविधियां और पर्यावरण में बदलाव सबसे बड़े जिम्मेदार हैं। जुगनुओं के लिए प्रकाश प्रदूषण सबसे बड़ा खतरा है। जुगनू रात के अंधेरे में अपने साथी को आकर्षित करने और प्रजनन के लिए चमकते  हैं। हर जगह तेज कृत्रिम रोशनी  के कारण वे एक-दूसरे की चमक देख नहीं पाते, जिससे उनका प्रजनन चक्र बाधित हो रहा है। जुगनू नमी वाले स्थानों, खेतों की मेड़ों, जंगलों और पानी के स्रोतों के पास पनपते हैं। शहरीकरण, जंगलों की कटाई और कंक्रीट के बढ़ते जाल के कारण उनके प्राकृतिक आवास खत्म हो रहे हैं। खेतों और बगीचों में डाले जाने वाले रासायनिक कीटनाशक न केवल वयस्क जुगनुओं को ख़त्म कर रहे हैं ।

जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ा कारण बना है।  जुगनू के लार्वा को जीवित रहने के लिए मिट्टी में नमी की आवश्यकता होती है। सूखे और बढ़ते तापमान के कारण मिट्टी की नमी खत्म हो रही है, जिससे उनकी नई पीढ़ी पनप नहीं पा रही है।

पहले अमूमन हर घर में बाग़-बगीचा हुआ करता था और रात होते जुगनू टिमटिमाने  लगते थे अब बाग़-बगीचा पर कंक्रीट का जंगल उग आया है। मजबूरन जुगनू अपने अनुकूल जगह चले गए या असुरक्षित जीवन के अभाव में दम तोड़ दिए। प्रकृति के अनमोल जीव जुगनू की स्थिति चिंताजनक है। वहीँ, जुगनू की कुछ सामान्य प्रजातियां अभी भी पर्यावरण के अनुकूल खुद को ढाल रही हैं। रात के समय बाहरी लाइटें बंद रखने, कीटनाशकों का प्रयोग कम करने और अपने आसपास नमी व हरियाली वाले प्राकृतिक स्थान बचाकर रखने से प्रकृति के टिमटिमाते जीव जुगनू  को बचाया जा सकता है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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