शिकारी पक्षियों से गौरैया की घटती आबादी

संजय कुमार / घरेलू गौरैया के संख्या में कमी के पीछे शिकारी पक्षी भी एक कारण हैं। देखा गया है कि इन्सान के आसपास जहाँ-जहाँ गौरैया रहने लगी, वहां देर सवेर शिकारी मांसाहारी पक्षी भी पहुँच जाते हैं। यह सच है कि गौरैया इंसान के साथ और उसके आसपास रहती है क्योंकि यहाँ उसे सुरक्षा…

संजय कुमार / घरेलू गौरैया के संख्या में कमी के पीछे शिकारी पक्षी भी एक कारण हैं। देखा गया है कि इन्सान के आसपास जहाँ-जहाँ गौरैया रहने लगी, वहां देर सवेर शिकारी मांसाहारी पक्षी भी पहुँच जाते हैं। यह सच है कि गौरैया इंसान के साथ और उसके आसपास रहती है क्योंकि यहाँ उसे सुरक्षा के साथ-साथ दाना, पानी और रहने ( घोंसला) की जगह मिलती है। गौरैया की संख्या यहाँ बढती है तो इकोसिस्टम में मांसाहारी पक्षियों को भी बुलावा आ जाता है। कह सकते हैं जहाँ शिकार ज्यादा, वहां शिकारी आयेंगे ही। पिछले कई साल में गाँव-शहरों में गौरैया घटी है, और उसी अनुपात में कुछ मांसाहारी पक्षी बढ़े भी हैं।

शिकारी पक्षी में शिकरा / बाज  गौरैया की सबसे बड़ी दुश्मन है। जहाँ गौरैया का वास होता है वहां  बिजली के तार, पेड़ की ऊँची डाल,मुंडेर  से घात लगाकर झपट्टा मार गौरैया या उसके बच्चे को शिकार बना लेते हैं। गौरैया जब बच्चों के साथ झुंड में रहती है तब यह तेजी से हमला बोलता है और एक दो गौरैया को पंजो से पकड लेता हैं। हालाँकि शिकरा / बाज की आहाट से दूसरे छोटे पक्षी शोर मचा कर खतरे से सबको आगाह करते हैं। जो नहीं संभाला शिकार बन जाता है। एक अनुमान के अनुसार एक शिकरा/बाज एक दिन में तीन से चार गौरैया को शिकार बना लेता हैं। काला चील भी गौरैया स्थल पर मंडराता रहता हैं और कमजोर, बीमार या बच्चा जो गौरैया उड़ नहीं पाती उसे उठा लेता। कौआ भी गौरैया को शिकार बनाता है खासकर बच्चे को। कौआ उड़ते हुए गौरैया के झुण्ड से जानबूझ कर टकराता है और जो गौरैया जमीन पर गिरी उसे उठा लेता है। कौआ अंडा चोर भी है वह घोंसले की खोज करता है और अंड्डे निकाल लेता है। या घोंसला से नवजात बच्चा जमीन  पर गिरता है तो उसे ले भागता है। उल्लू रात में शिकार खोजता है और घर की छज्जा,मुंडेर, पेड़ आदि  पर सोती गौरैया को पकड़ता है। पक्षियों के साथ-साथ ही बिल्ली, नेवला, साँप भी गौरैया के बड़े दुश्मन हैं। गौरैया के शिकार बनने के पीछे कई कारण हैं। इसके रहने से शिकारी पक्षी आते हैं, वहीँ घर-आँगन से इसके आवास का छिन जाना भी है। मजबूरन उसे पेड़ या घर से बाहर घोंसला बनाना पड़ता है जहाँ इन्सान की आवाजाही कम होने से शिकारी पक्षी आसानी से आ जाते हैं। घर के आसपास कांटेदार झाड़ी, बोगनविलिया, मेहंदी आदि के पेड़ नहीं होने से गौरैया खुले में बैठती है अगर ये पेड़ हो तो गौरैया छुपेगी और  शिकरा का खतरा कम हो जायेगा। दाना को खुले में रखने से कौआ-कबूतर आदि आते हैं। हालाँकि, इकोसिस्टम में शिकारी तो आयेंगे ही लेकिन गौरैया का घर हमने उजाडा और शिकारी को छत दे दी। जहाँ शिकारी पक्षी आने लगते हैं  वहाँ से गौरैया पलायन भी कर जाती है।  गौरैया जहाँ रहती है वहाँ शिकारी आएगा ही यह तय है  लेकिन, गौरैया इन्सान के भरोसे उसके पास आती है, इसलिए इंसान का दायित्व है कि गौरैया का संरक्षण करें।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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