जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारण : मौतों का आंकड़ा बढ़ने की आशंका
पूरे यूरोप में इस समय भीषण गर्मी और जानलेवा लू का भयंकर कहर जारी है, जिसके कारण अब तक महाद्वीप में 5,600 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, ‘हीट डोम’ (Heat Dome) के कारण गर्म हवाएं यूरोपीय देशों के ऊपर ही फंस गई हैं, जिससे तापमान कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़कर 40°C से 44°C के पार पहुंच गया है। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारण है।
वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि औद्योगिक क्रांति के बाद से इंसानों द्वारा की जा रही गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधन जलाना, वनों की कटाई और फैक्ट्रियों का प्रदूषण के बिना यूरोप में ऐसी विनाशकारी गर्मी और ‘हीट डोम’ जैसी स्थिति बनना लगभग नामुमकिन था। देखा जाये तो जलवायु परिवर्तन इस तरह की भीषण गर्मी को कई तरीकों से बढ़ावा दे रहा है। इसमें ग्रीनहाउस गैसों का ‘ब्लैंकेट इफेक्ट’ प्रमुख है। हवा में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसों की मात्रा लगातार बढ़ रही है। ये गैसें सूरज की गर्मी को सोख लेती हैं और उसे वापस अंतरिक्ष में जाने से रोकती हैं। इससे धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है, जिससे सामान्य से अधिक गर्म हवाएं चलने लगी हैं। वहीँ, जेट स्ट्रीम में बदलाव और ‘हीट डोम’ भी एक कारण है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी के ध्रुवों और भूमध्य रेखा के बीच तापमान का संतुलन बिगड़ रहा है। इससे ‘जेट स्ट्रीम’ ( तेज चलने वाली हवाएं जो मौसम को नियंत्रित करती हैं) कमजोर और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। जब यह हवा रुक जाती है, तो एक ही जगह पर उच्च दबाव का क्षेत्र बन जाता है। यह क्षेत्र एक ढक्कन या ‘डोम’ की तरह काम करता है, जो गर्म हवा को नीचे दबाकर उसी जगह पर कैद कर देता है, जिससे तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाता है। गर्मी के चक्र का तीव्र होना अहम् है। जलवायु परिवर्तन के कारण गर्म हवाएं चलती हैं, जिससे मिट्टी की नमी पूरी तरह सूख जाती है। जब मिट्टी सूखी होती है, तो सूरज की ऊर्जा पानी को वाष्पित करने में खर्च नहीं होती, बल्कि सीधे जमीन और हवा को और ज्यादा गर्म करने लगती है। इससे गर्मी का एक ऐसा दुष्चक्र शुरू हो जाता है जो दिन-ब-दिन तापमान को और खतरनाक बनाता जाता है। डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोप बाकी दुनिया की तुलना में दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि ग्लोबल वार्मिंग अब केवल भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की एक कड़वी और जानलेवा हकीकत बन चुकी है।
‘हीट डोम’ से देशवार में रिकॉर्ड टूटे हैं। फ्रांस में भीषण गर्मी के कारण अकेले 2,000 से अधिक लोगों की मौत दर्ज की गई है। फ्रांस के पिसोस में पारा 44.3°C तक पहुंच गया, जिसने इतिहास के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। देश के 58 विभागों में रेड अलर्ट जारी किया गया है।
जर्मनी के दक्षिण-पश्चिमी शहर सारब्रुकन में तापमान 41.3°C और पूर्वी हिस्से में 41.7°C रिकॉर्ड किया गया, जो जर्मनी के इतिहास में जून का सबसे उच्चतम तापमान है। स्पेन के एंडुजार और मोंटोरो में तापमान 45.1°C के डरावने स्तर पर पहुंच गया। स्पेन में अब तक 1,000 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं।
मध्य व उत्तरी यूरोप में आमतौर पर ठंडे रहने वाले देशों जैसे चेक गणराज्य (41.1°C), पोलैंड (40.5°C), स्लोवाकिया (41.3°C) और हंगरी (42°C) में भी ऐतिहासिक रिकॉर्ड टूट गए हैं। यहाँ तक कि ठंडे देश डेनमार्क में भी तापमान 37°C तक जा पहुँचा है।
हीट वेव से बुनियादी ढांचे और जनजीवन पर असर पड़ा है। बिजली और पानी का संकट बढ़ा है। एसी और कूलिंग सिस्टम की भारी मांग के कारण बिजली ग्रिड पूरी तरह चरमरा गए हैं। कई देशों में बिजली कटौती और पानी की भारी किल्लत हो गई है। यातायात प्रभावित हुआ है, अत्यधिक गर्मी के कारण जर्मनी और फ्रांस में रेलवे ट्रैक मुड़ रहे हैं और सड़कों का डामर पिघल रहा है, जिससे ट्रेनें और उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं। सूखे और भीषण गर्मी के चलते स्पेन, बोस्निया और भूमध्यसागरीय तटीय इलाकों के जंगलों में भयंकर आग भड़क उठी है, जिससे हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। फ्रांस में भीषण गर्मी के कारण लाखों मुर्गियों और मवेशियों की मौत हो गई है, जिससे दूध और मांस उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है, जो वैश्विक औसत से दोगुनी गति से गर्म हो रहा है।













