संजय कुमार/ “स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स 2023” ने अपनी रिपोर्ट में भारत के कई पक्षियों की प्रजातियां को खतरे में बता कर सबको चौंका दिया है। साथ ही चिड़ियों के 178 प्रजातियों को संरक्षित करने की बात भी कही है। विलुप्ति के सवालों से लिपटी गौरैया के ऊपर भी मंडराते खतरे की चर्चा होती रहती है। हालाँकि अभी ऐसी स्थिति नहीं है कि गौरैया लाल सूचि में शामिल हो, हालाँकि स्थिति अच्छी नहीं हैं। इसके बावजूद खतरा तो है ही, क्योंकि यह कई इलाकों से विलुप्त हो चुकी है। ऐसे में गौरैया की संख्या को लेकर अक्सर सवाल भी उठता रहता है कि कितनी गौरैया एक गांव, एक शहर, एक मोहल्ला, एक राज्य या फिर पूरे देश या दुनिया भर में है? वैसे एक आंकलन के अनुसार दुनिया भर में गौरैया की आबादी तकरीबन 1.4 से 1.6 अरब हैं।
वर्ल्डस्टैट्स.कॉम (worldostat.com) के अनुसार गौरैया की अनुमानित वैश्विक आबादी लगभग 1.4 अरब है और ये शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक, अलग-अलग तरह के माहौल में पाई जाती हैं। गौरैया ‘पैसरेडे’ परिवार से संबंधित हैं, जिसमें लगभग 50 अलग-अलग प्रजातियां शामिल हैं। इतनी बड़ी संख्या में होने के बावजूद, हर गौरैया प्रजाति की सही आबादी का पता लगाना मुश्किल है। इसके कई कारण हैं, जैसे कि इनका बहुत बड़े इलाके में फैला होना, मौसम के हिसाब से एक जगह से दूसरी जगह जाना, और अलग-अलग प्रजातियों में समानताएं होना जिससे उन्हें पहचानना मुश्किल हो जाता है। गौरैया की आबादी को समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि इससे जैव विविधता, पारिस्थितिक स्वास्थ्य और पर्यावरण में बदलावों का पक्षी प्रजातियों पर पड़ने वाले असर के बारे में जानकारी मिलती है।
गौरैया की आबादी से जुड़ा डाटा पक्षी वैज्ञानिकों और पक्षी संरक्षण संगठनों द्वारा किए गए विभिन्न अध्ययनों, अवलोकनों और अनुमानों से लिया गया है। हालांकि ये आंकड़े गौरैया की आबादी के बारे में एक सामान्य समझ देते हैं, लेकिन इनमें बदलाव हो सकता है। ऐसा पक्षी आबादी की बदलती प्रकृति, डाटा इकट्ठा करने के तरीकों में अंतर और गौरैया जैसी छोटी, इधर-उधर घूमने वाली प्रजातियों का सर्वेक्षण करने में आने वाली मुश्किलों के कारण होता है। इसलिए, यहां दिए गए आंकड़ों को सटीक गिनती के बजाय अनुमान माना जाना चाहिए।
सबसे ज़्यादा आबादी वाली शीर्ष 10 गौरैया प्रजातियों में घरेलू गौरैया यानि हाउस स्पैरो की अनुमानित संख्या 500 से 1,500 मिलियन है यानि 50 करोड़ से 150 करोड़, जबकि यूरेशियन ट्री स्पैरो की संख्या 200 से 300 मिलियन हैं। वहीँ चिपिंग स्पैरो 200 से 300 मिलियन हैं । सॉन्ग स्पैरो की संख्या भी 200 से 300 मिलियन है। नॉर्दर्न ग्रे-हेडेड स्पैरो 20 से 50 मिलियन तक हैं । सदर्न ग्रे-हेडेड स्पैरो भी 20 से 50 मिलियन तक है । स्पैनिश स्पैरो की संख्या 10 से 20 मिलियन है। इटैलियन स्पैरो 10 से 20 मिलियन अनुमानित है । स्वेन्सन स्पैरो भी 10 से 20 मिलियन तक हैं । जबकि केप स्पैरो 10 से 20 मिलियन है ।
हाउस स्पैरो 500 से 1,500 मिलियन की अनुमानित आबादी के साथ सूची में सबसे ऊपर है, जो इसे दुनिया भर में सबसे आम और आसानी से पायी जाने गौरैया प्रजातियों में से एक है। शहरी माहौल में फलने-फूलने की इसकी क्षमता और इंसानी बस्तियों के साथ इसका करीबी जुड़ाव इसकी बड़ी संख्या का कारण है। इसके बाद यूरेशियन ट्री स्पैरो, चिपिंग स्पैरो और सॉन्ग स्पैरो का नंबर आता है; इन सभी की आबादी का अनुमान 20 से 30 करोड़ के बीच है। ये प्रजातियां भी बड़े इलाके में फैली हुई हैं और इनके रहने की जगहें एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे कई महाद्वीपों में हैं।
टॉप दस की लिस्ट में बची हुई प्रजातियां, जैसे नॉर्दर्न और सदर्न ग्रे-हेडेड स्पैरो, स्पैनिश स्पैरो और केप स्पैरो, की आबादी कम है लेकिन फिर भी काफी अहम है। ये प्रजातियां अक्सर कुछ खास इलाकों में ही पाई जाती हैं, खासकर अफ्रीका और यूरोप के कुछ हिस्सों में। हाउस स्पैरो की तुलना में इनकी संख्या कम होने के बावजूद, ये अपने-अपने इकोसिस्टम में अहम भूमिका निभाती हैं और कुल बायोडायवर्सिटी और इकोलॉजिकल बैलेंस में योगदान देती हैं।
बात भारत में संख्या की तो स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स 2020, रेंज, ट्रेंड्स और कंजर्वेशन स्टेट्स की रिपोर्ट में दावा किया गया कि, पिछले 25 साल से गौरैया की संख्या भारत में स्थिर बनी हुई है। गुजरात के गांधीनगर 15 से 22 फरवरी 2020 को आयोजित 13वें अन्तर्राष्ट्रीय प्रवासी प्रजाति संरक्षण सम्मेलन में आयी एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि भारत में गौरैया की संख्या स्थिर है। वैसे यह भी सच है कि कई गांव और शहर जहां ये दिखती थी वहां सालों से नहीं दिखी। जबकि एक शहर/गांव/मोहल्ला में कुछ इलाके में दिखती है तो कुछ इलाके में नहीं। रेलवे स्टेशनों पर गौरैया को झुंड में प्रवास करते देखा जा सकता है। रेलवे स्टेशन के सभी प्लेटफॉर्म पर लगे शेड और खुल्ले- खुल्ले ईमारत आवास देते है। साथ ही उन्हें भरपूर आहार सहज मिल जाता है। यहाँ पेड़ नहीं होने से फर्क नहीं पड़ता है बिजली के तार पर बड़ी संख्या में बैठती है। यह पूरा दृश्य देखने लायक होता है, जो अमूमन देश भर में दिखता है। साथ ही कई लोगों के घरों में गौरैया बड़ी संख्या में रहती है।
गौरैया की घटती संख्या यानि विलुप्ति की ओर बढ़ने के मद्देनजर इसके संरक्षण के प्रति केंद्र सरकार ने सजगता दिखाई है ताकि इसकी संख्या में गिरावट नहीं आये और वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (अंतिम अद्यतन 1-4-2023) को अधिसूचित कर घरेलू गौरैया सहित सात गौरैया को अनुसूची-II में शामिल कर लिया है। इनमें यूरेशियन ट्री स्पैरो (पासर मोंटैनस), हाउस स्पैरो (पासर डोमेस्टिकस), रॉक स्पैरो पेट्रोनिया (पेट्रोनिया), रसेट स्पैरो (पासर सिनामोमियस), सिंध स्पैरो (पासर पाइरहोनोटस), स्पैनिश स्पैरो (पासर हिस्पानियोलेंसिस), पीले गले वाली गौरैया (जिमनोरिस ज़ैंथोकोलिस), जो भारत में पाई जाती है,शामिल है। कह सकते हैं गौरैया को खतरे से बचाना है। पहले गौरैया अनुसूची-III में शमिल थी। लेकिन अब अनुसूची-II में आने से इसकी सुरक्षा-संरक्षा और बढ़ गयी है। इसके तहत जीव को उच्च सुरक्षा प्रदान की जाती है। मानव जीवन को खतरे के अलावा उनका शिकार नहीं किया जा सकता। इसके तहत इसको एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए चीफ वाइल्ड लाइफ़ वार्डन की अनुमति जरुरी होगी।
भारत में गौरैया की संख्या को देखें तो कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक गौरैया दिखती है, तो कहीं नहीं। फिर भी देश में गौरैया की कुल संख्या को लेकर सवाल अक्सर उठता रहता है। हालाँकि अभी तक भारत में आधिकारिक (सरकारी) तौर पर कोई गणना नहीं हुई है। लेकिन, संस्थागत या व्यक्तिगत गणना की खबरें आती रहती है। अगर बिहार के एक शहर को ले, तो कोई पचीस, पचास, सौ, तो कोई हजार, तो कोई एक भी नहीं बताता है। वैसे इसकी गणना आसान नहीं है।
देखा जाये तो गौरैया प्रवासी पक्षी नहीं हैं। यह झुंड में रहने वाली है और पलायन भी करती हैं। ज्यादातर एक से पांच किलोमीटर के दायरे में घूमते या स्थानांतरण करते रहते हैं। गौरैया ज्यादातर छोटे-छोटे पेड़ों और झाड़ियों में रहती है। पेड़ों में बबूल, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, बांस और कनेर आदि शामिल हैं। इसमें छुप कर बैठने से इसकी गिनती आसान नहीं है ऐसे में इसे उड़ा कर तस्वीर लेकर फिर उसकी संभावित गिनती की जा सकती है। अगर एक दिन में एक पेड़ पर सौ गौरैया बैठती है तो जरुरी नहीं कि दूसरे दिन उतनी ही गौरैया उस पर बैठे, दूसरे पेड़ पर भी दूसरी जगह बैठ जाती है। इसलिए सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों की माने तो गौरैया की गणना के लिए एक पॉइंट से चारो दिशा में एक से पांच किलोमीटर के दायरे में एक ही दिन में गौरैया की गणना पद्धति को अपनायी जा सकती हैं।
भारत में गौरैया की स्थिति जानने के लिए बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी ने 2021 में ऑनलाइन सर्वे कराया था। भारतीय जैव विविधता संरक्षण संस्थान ने 2015 में वृहद स्तर पर गणना की थी। लखनऊ में सिर्फ 5,692 और पंजाब के कुछ इलाकों में लगभग 775 गौरैया देखीं गईं थीं। तिरुवनंतपुरम में तो सिर्फ 29 गौरैया देखी गईं। कन्याकुमारी के स्थानीय एनजीओ “त्रवनकोर नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी” ने शहर के अलग-अलग जगहों पर इनकी संख्या को लेकर 2017 में सर्वेक्षण किया। इसमें पाया गया कि जहां एक साल पहले तक 82 गौरैया दिखती थीं, वहां अब उनकी संख्या घटकर मात्र 23 रह गई है। कानपुर जिले में सेव स्पैरो प्रोजेक्ट रिपोर्ट 2015 में बताया गया है कि जिले में कुल 37 साइटों का सर्वेक्षण किया गया और 581 स्पैरो (गौरैया की संख्या) दर्ज किए गए।
पटना में इनवारमेंट वैरियर और हमारी गौरैया बिहार, ने विभिन्न इलाकों का जायजा लेकर गौरैया की अनुमानित संख्या तलाशने की कोशिश की। हमारी गौरैया को कंकड़बाग सहित कई मुहल्लों में 25 से एक सौ दिखी तो कई में एक भी नहीं। वहीँ, पटना सहित पास के रेलवे स्टेशनों पर सौ से ज्यादा दिखी। पुराने मोहल्लों में यह 50 से सौ की संख्या में दिखी।
एनवायरनमेंट वाररिर्स बिहार की टीम के द्वारा पटना के विभिन्न इलाक़ों से प्राप्त आँकड़ो के अध्ययन तथा अवलोकन के आधार पर, इस नतीजे पर पहुँचा गया कि पटना नगर निगम क्षेत्र के 40% हिस्से से गौरैया विलुप्त हो चुकी है या न के बराबर है। पटना जंक्शन, राजेंद्र नगर, महेंद्रू, बाजारसमिति आदि स्थानों के आसपास इसकी संख्या 200 से भी अधिक है, लेकिन आनन्दपुरी, राजीव नगर, पाटलिपुत्र कॉलोनी आदि क्षेत्रों में इनकी संख्या 15 से भी कम है। टीम के सर्व के आधार पर पटना नगर निगम क्षेत्र में गौरैया की संभावित संख्या साढ़े छह से सात हज़ार के बीच है। अगर पूरे बिहार (ग्रामीण और शहरी इलाका) को देखें तो गया, भागलपुर, मुंगेर, खगड़िया, नवगछिया, रोहतास, लखीसराय, भोजपुर, सारण, वैशाली, किशनगंज, पूर्वी एवं पश्चमी चंपारण, जमुई, आदि के इलाकों में गौरैया एक सौ से हजार की तादाद में हैं, लेकिन कई इलाकों में नहीं दिखती है। लखीसराय जिले के ग्रामीण इंदु शेखर के घर में सौ से ज्यादा गौरैया थी आज इसकी संख्या 25 हो गयी है। गौरैया की संख्या को लेकर अमूमन कई गाँव/शहर की यह तस्वीर है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने 2002 में गौरैया को लुप्तप्राय प्रजातियों में शामिल कर दिया था। जबकि ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी ऑफ़ प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स ने भारत सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में भी कई अध्ययनों के आधार पर गौरैया को 2017 में ‘रेड लिस्ट’ में डाला (डाउन टू अर्थ के अनुसार)। ‘रेड लिस्ट’ में उन जीव-जंतुओं या पक्षियों को डाला जाता है, जिन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा होता है।
गौरैया का इंसानों के साथ का संबंध बहुत पुराना है। बेथलहम की एक गुफा से 4,00,000 साल पुराने जीवाश्म के साक्ष्य से पता चलता है कि घरों में रहने वाले गौरैयों ने प्रारंभिक मनुष्यों के साथ अपना स्थान साझा किया था। वहीँ, रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंसानों और गौरैयों के बीच का बंधन 11,000 साल पुरानी बात है। वैसे गौरैया से विश्व को प्रथम परिचय 1851 में अमेरिका के ब्रूकलिन इंस्टीट्यूट ने कराया था। गौरैया की संख्या में कमी के पीछे के कारणों में बढ़ता आवासीय संकट, आहार की कमी, खेतों में कीटनाशक का व्यापक प्रयोग, जीवनशैली में बदलाव, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, शिकार, गौरैया को बीमारी और मोबाइल फोन टावर से निकलने वाले रेडिएशन(दोषी माना जाता है लेकिन स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स 2020- रेंज, ट्रेंड्स और कंजर्वेशन स्टेट्स ने अपनी रिपोर्ट में इसे ख़ारिज किया है। बहरहाल, गौरैया संरक्षण की पहल ज़रूरी है हर कोई कहे मेरे यहाँ है गौरैया।
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