गैंडा संरक्षण की कोशिशों से बढ़ी उम्मीद, लेकिन कई प्रजातियां अब भी संकट में

22 सितंबर को विश्व गैंडा दिवस संजय कुमार/ ‘वर्ल्ड राइनो डे’ (विश्व गैंडा दिवस) पर भारत गैंडों के संरक्षण में मिली एक बड़ी कामयाबी का जश्न मना रहा है। एक सींग वाले गैंडों को विलुप्त होने की कगार से बचाकर उनकी आबादी को फिर से बढ़ाना। उनके रहने की जगहों (हैबिटैट) को सुरक्षित रखने और…

22 सितंबर को विश्व गैंडा दिवस

संजय कुमार/ ‘वर्ल्ड राइनो डे’ (विश्व गैंडा दिवस) पर भारत गैंडों के संरक्षण में मिली एक बड़ी कामयाबी का जश्न मना रहा है। एक सींग वाले गैंडों को विलुप्त होने की कगार से बचाकर उनकी आबादी को फिर से बढ़ाना। उनके रहने की जगहों (हैबिटैट) को सुरक्षित रखने और अवैध शिकार को रोकने की कोशिशों की वजह से, आज भारत में दुनिया के कुल गैंडों की आबादी का लगभग 81.5% हिस्सा मौजूद है। 20वीं सदी की शुरुआत में, भारत में एक सींग वाले गैंडे विलुप्त होने की कगार पर थे। अवैध शिकार ने उनकी आबादी को बहुत कम कर दिया था और उनके रहने की जगहें भी सिकुड़ रही थीं। भारत के सबसे शानदार जंगली जानवरों में से एक, अपने ही देश से गायब हो रहा था। लेकिन, संरक्षण की कोशिशों ने इस कहानी का रुख बदल दिया।

‘स्टेट ऑफ द राइनो’ के ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में सभी प्रजातियों को मिलाकर कुल गैंडों की संख्या लगभग 26,700 हैं। भारत में 1980 में 1500 आसपास गैंडों की संख्या थी लेकिन संरक्षण के प्रयास से 2024 में 4000 के आसपास संख्या हो गयी। असम इस प्रजाति का मुख्य गढ़ बना हुआ है, जहाँ 3,260 गैंडे हैं। इनमें से 2,600 से ज़्यादा गैंडे अकेले काजीरंगा नेशनल पार्क में रहते हैं। यह पार्क गैंडों को बचाने की पक्की कोशिशों का केंद्र बन गया, जिसमें सुरक्षित आवास, अवैध शिकार रोकने के उपाय और समर्पित वन कर्मचारी शामिल थे। ‘इंडियन राइनो विजन’ के तहत, गैंडों को दूसरी सुरक्षित जगहों पर भी भेजा गया ताकि उनकी आबादी बढ़ाई जा सके; इनमें मानस नेशनल पार्क भी शामिल है। इस ‘वर्ल्ड राइनो डे’ पर, भारत संरक्षण के उस सफर का जश्न मना रहा है जो अभी भी जारी है  यह एक विशालकाय जानवर को विलुप्त होने की कगार से वापस लाने की कहानी है।

हर वर्ष 22 सितंबर को विश्व गैंडा दिवस मनाने का  उद्देश्य गैंडों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और अवैध शिकार, सींगों के लिए होने वाले वन्यजीव अपराध तथा प्राकृतिक आवास के नुकसान जैसी चुनौतियों की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करना है। आज दुनिया में गैंडों की केवल पांच प्रजातियां बची हैं-सफेद गैंडा, काला गैंडा, एक सींग वाला भारतीय गैंडा, जावन गैंडा और सुमात्राई गैंडा।

दुनिया में कितने गैंडे हैं?

इंटरनेशनल राइनो फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में सभी पांच प्रजातियों को मिलाकर लगभग 26,700 गैंडे बचे हैं। हालांकि कुल संख्या में वृद्धि संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाती है, लेकिन अलग-अलग प्रजातियों की स्थिति काफी अलग है। ये आंकड़े उपलब्ध नवीनतम अंतरराष्ट्रीय आकलनों पर आधारित हैं और अलग-अलग वर्षों में सर्वेक्षण से सामने आये हैं ।

अफ्रीका में संरक्षण की चुनौती

अफ्रीका में वर्ष 2024 के अंत तक लगभग 22,540 गैंडे दर्ज किए गए थे। इनमें करीब 15,752 सफेद और 6,788 काले गैंडे शामिल थे। आईयूसीएन के अनुसार, 2024 में अफ्रीकी गैंडों की कुल संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में 6.7 प्रतिशत कमी दर्ज हुई। हालांकि इसी अवधि में काले गैंडों की संख्या बढ़ी। गैंडों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में अवैध शिकार, सींगों की अवैध मांग, सूखा, प्राकृतिक आवास में बदलाव और छोटे तथा अलग-थलग पड़ते आवास शामिल हैं। अच्छी बात यह है कि अफ्रीका में गैंडों के अवैध शिकार की दर 2024 में घटकर 2.15 प्रतिशत रह गई, जो 2011 के बाद सबसे कम दर थी। इसके बावजूद कुछ क्षेत्रों में 2025 के दौरान भी अवैध शिकार जारी रहा।

भारत बना एक सींग वाले गैंडे के संरक्षण की मिसाल

भारतीय गैंडा तीन एशियाई प्रजातियों में सबसे बड़ा है और जावा गैंडे के समान एक सींग वाला होता है। इसके विपरीत, सुमात्रा गैंडे के दो सींग होते हैं, जो एशियाई और अफ्रीकी गैंडों की तरह दिखते हैं।

भारत के लिए गैंडा संरक्षण की कहानी अपेक्षाकृत सकारात्मक है। ग्रेटर वन-हॉर्न्ड राइनो यानी भारतीय एक सींग वाला गैंडा आज मुख्य रूप से भारत और नेपाल में पाया जाता है। आईयूसीएन  के अनुसार, दोनों देशों में मिलाकर इसकी संख्या करीब 4,075 के आसपास है और इसे आईयूसीएन की लाल सूचि  में असुरक्षित श्रेणी में रखा गया है। भारत में इसका सबसे बड़ा गढ़ असम है। सरकार के अनुसार, असम में गैंडों की संख्या 1980 के दशक में लगभग 1,500 से बढ़कर 2024 में 4,014 से अधिक हो गई। असम में दुनिया के लगभग  80 प्रतिशत एक सींग वाले गैंडे  पाए जाते हैं। अकेले काजीरंगा में वैश्विक आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा होने का अनुमान दिया गया है। यह वृद्धि अचानक नहीं हुई। इसके पीछे कठोर एंटी-पोचिंग व्यवस्था, वनकर्मियों की तैनाती, वैज्ञानिक तरीके से वन्यजीव प्रबंधन, घासभूमि और आर्द्रभूमि का संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी महत्वपूर्ण रही है। काजीरंगा का संरक्षण मॉडल इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में रहा है।

एक सींग वाला गैंडा – भारत का संरक्षण प्रतीक

गैंडे प्राचीन जीव हैं, जो अपने आकार, मोटी त्वचा और विशिष्ट सींगों के कारण लाखों वर्षों से अस्तित्व में हैं। बड़ा एक सींग वाला गैंडा मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है, जो तीन एशियाई गैंडों की प्रजातियों में सबसे बड़ा है और भारत में संरक्षित है । असम के काजीरंगा में इसकी 70 % से अधिक आबादी निवास करती है। यह प्रजाति वन्यजीव संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। अग्रिम मोर्चे पर वनों में निवेश और वन्यजीव आवासों के वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर देने वाले संरक्षण के काजीरंगा मॉडल को वैश्विक मान्यता मिली है। इस मॉडल में जैव विविधता संरक्षण, अवैध शिकार के खिलाफ रणनीतियों और पुनर्वनीकरण कार्यक्रमों शामिल किया गया है, जिससे गैंडों का दीर्घकालिक अस्तित्व सुनिश्चित होता है।

भारत में असम गैंडों के संरक्षण में अग्रणी है।  यह स्थान इसने गैंडों के लिए समर्पित वन क्षेत्रों तथा स्थानीय समुदायों के सहयोग के माध्यम से एक सदी से भी अधिक समय से बनाए रखा है। विख्यात, एक सींग वाले बड़े गैंडे (राइनोसेरोस यूनिकॉर्निस) की सुरक्षा के लिए राज्य की प्रतिबद्धता गौरव और सुदृढ़ता का प्रतीक बन गई है। गैंडे-केंद्रित दृष्टिकोण को बनाए रखते हुए, असम वन्यजीव संरक्षण में वैश्विक स्तर पर भी सबसे आगे है। इस विश्व गैंडा दिवस के अवसर पर  हम असम राज्य  के प्रयासों की सरहाना करते हैं और भावी पीढ़ियों के लिए इस राजसी प्रजाति की रक्षा करने का फिर से संकल्प लेते हैं।

सबसे बड़ी चिंता एशिया की दो प्रजातियों को लेकर

जहां भारतीय गैंडे की संख्या में वृद्धि हुई है, वहीं जावन और सुमात्राई गैंडे गंभीर संकट में हैं। आईयूसीएन के अनुसार, एशिया में केवल लगभग 50 जावन गैंडे और 34–47 सुमात्राई गैंडे बचे हैं। 2019 से 2023 के बीच जावन गैंडों के 26 शिकार दर्ज हुए, जिससे इस अत्यंत छोटी आबादी पर गंभीर असर पड़ा।

गैंडे की पारिस्थितिकी

गैंडे पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये शाकाहारी होते हैं। ये खुले में चर कर घास के मैदानों को एक आकार देते हैं, जिससे अन्य वन्यजीवों को लाभ पहुंचाने वाले खुले स्थान बनते हैं। उनके कीचड़ या उथले पानी में जलकुंड बना देते हैं, जिससे विभिन्न प्रजातियों को फायदा होता है।

भारतीय गैंडे अपने एक सींग और मोटी, कवच जैसी त्वचा के लिए जाने जाते हैं। बड़े गैंडों का वजन 2,800 किलोग्राम तक हो सकता है और वे 45-50 साल तक जीवित रहते हैं। गैंडे मुख्य रूप से घास, पत्ते, फल और जलीय पौधे खाते हैं।

गैंडे बाढ़ के मैदानों, दलदलों और नदी के किनारे के जंगलों में पलते-बढ़ते हैं, खासकर भारत और नेपाल के तराई क्षेत्र में। भारतीय गैंडे मुख्य रूप से असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और नेपाल के संरक्षित क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

गैंडे संरक्षण के सकारात्मक प्रभाव

गैंडे का संरक्षण केवल जंगलों में उनकी सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसके लिए अवैध वन्यजीव व्यापार पर नियंत्रण, मजबूत एंटी-पोचिंग नेटवर्क, बेहतर निगरानी तकनीक, सुरक्षित और जुड़े हुए प्राकृतिक आवास, वैज्ञानिक प्रजनन एवं पुनर्वास कार्यक्रम और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है। भारत का अनुभव बताता है कि लगातार संरक्षण प्रयासों से गैंडों की संख्या में उल्लेखनीय सुधार संभव है। लेकिन जावन और सुमात्राई गैंडों की स्थिति यह भी याद दिलाती है कि संख्या बढ़ने के बावजूद संरक्षण की लड़ाई खत्म नहीं हुई है।

केंद्र सरकार गैंडे के संरक्षण के लिए अथक प्रयास कर रही है और इन प्रयासों का प्रभाव निम्नलिखित उपलब्धियों के रूप में दिखाई देता है: जनसंख्या वृद्धि – 1960 के दशक (600 गैंडे) से 2024 (4,000 से अधिक गैंडे) तक असम में गैंडों की में बढ़ोत्तरी।

  1. ग्रेटर काजीरंगा में वैश्विक गैंडे की आबादी – एशियाई गैंडे की इस प्रजाति की वैश्विक आबादी का 70 % काजीरंगा में रहता है।
  2. मशहूर पर्यटन स्थल – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों पर्यटकों के लिए एक प्रतिष्ठित वन्यजीव पर्यटक स्थल के रूप में अपनी पहचान बनाई है।
  3. प्रधानमंत्री का दौरा – काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की अपनी पहली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वन रक्षकों (वन दुर्गा) के साथ दौरा, हाथी की सवारी और संरक्षण प्रयासों में उनकी भागीदारी आम लोगों में उत्साह और जागरूकता पैदा करती है।
  4. गैंडे के आवास क्षेत्र का विस्तार – ओरंग राष्ट्रीय उद्यान में 200 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र का विस्तार और गैंडों के आवास के लिए लाओखोवा-बुराचपोरी वन्यजीव अभयारण्य में 12.82 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फिर से दावा, गैंडों के आवास क्षेत्र में विस्तार को रेखांकित करता है ।
  5. नए संरक्षित क्षेत्र – सिकनाझार राष्ट्रीय उद्यान और पोबा वन्यजीव अभयारण्य जैसे नए घोषित संरक्षित क्षेत्र, गैंडों और अन्य वन्यजीवों के लिए आवास सुरक्षित करने के लिए असम की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
  6. अवैध शिकार के प्रति शून्य सहिष्णुता – गैंडों के अवैध शिकार के प्रति असम की शून्य-सहिष्णुता नीति के प्रतीक के रूप में 2,479 गैंडे के सींगों को जलाकर नष्ट कर दिया गया।

 गैंडे के अवैध शिकार में कमी

आजादी से पहले और उसके बाद भी गैंडों की सुरक्षा के लिए कई कानूनी उपाय किए गए हैं। इन उपायों में 1891 का असम वन संरक्षण अधिनियम और 1932 का बंगाल गैंडा संरक्षण अधिनियम शामिल है, जिनके तहत गैंडों को मारने, घायल करने या पकड़ने पर प्रतिबंध है, हालांकि आत्मरक्षा या लाइसेंस के तहत इसमें छूट है। स्वतंत्रता के बाद, 1954 के असम गैंडा संरक्षण अधिनियम ने इन सुरक्षा उपाओं को मजबूत किया। इसके अलावा, 1972 के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम और 2009 में इसके असम संशोधन ने अवैध शिकार के दोषियों के लिए दंड बढ़ा दिया, जिसमें बार-बार अपराध करने वालों के लिए आजीवन कारावास सहित कठोर सजाएं और अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए अधिक जुर्माना शामिल है। भारतीय राइनो विजन 2005 कार्यक्रम ने भी इसके संरक्षण प्रयासों को मजबूत किया है।

काजीरंगा की सफलता की कहानी

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान साल 2022 तक 2,613 गैंडों के साथ गैंडे  संरक्षण के लिए एक वैश्विक मॉडल है। सख्त सुरक्षा उपायों, स्मार्ट गश्त और सामुदायिक भागीदारी ने इसकी सफलता में योगदान दिया है। इसके अतिरिक्त, पार्क अधिकारियों और स्थानीय समुदायों के बीच साझेदारी ने मानव-वन्यजीव टकरावों को कम किया है, जिससे संरक्षण प्रयासों को और मजबूती मिली है। असम गैंडे की आबादी में 1966-2022 तक की वृद्धि (वास्तविक जनगणना रिकॉर्ड के आधार पर) काजीरंगा न केवल गैंडों के संरक्षण , बल्कि इको-टूरिज्म के लिए एक प्रमुख स्थल भी है, जो दुनिया भर से वन्यजीव उत्साही और फोटोग्राफरों को आकर्षित करता है। पर्यटन से प्राप्त राजस्व को संरक्षण कार्यों में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे गैंडों और अन्य वन्यजीवों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है। असम का काजीरंगा वन्यजीव संरक्षण और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में भारत के नेतृत्व का प्रतीक है।

गैंडे के संरक्षण के लिए प्रमुख खतरे

विश्व स्तर पर, गैंडे की प्रजातियां अनिश्चित खतरे का सामना कर रही हैं।  20वीं सदी की शुरुआत में इनकी आबादी लगभग 500,000 से घटकर आज लगभग 28,000 रह गई है। बची हुई पांच गैंडों की प्रजातियों में से तीन को गंभीर रूप से संकटग्रस्त के रूप में वर्गीकृत किया गया है। फिर भी, भारत में एक सींग वाले गैंडे ने इसके संरक्षण  संबंधी नीतियों और असम के अधिकारियों के समर्पित प्रयासों की बदौलत उल्लेखनीय तौर पर वापसी की है।

संरक्षण की सफलताओं के बावजूद, गैंडों को अवैध शिकार का खतरा बना हुआ है, पिछले एक दशक में उनके सींगों की मांग को पूरा करने के लिए लगभग 10,000 गैंडों को मार दिया गया है, जिन्हें पारंपरिक चिकित्सा और स्टेटस सिंबल के रूप में विशेष रूप से चीन और वियतनाम में बेशकीमती माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स और अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) के अनुसार, वैश्विक स्तर पर अवैध वन्यजीव उत्पादों की तस्करी में गैंडे के उत्पादों की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत है।

असम में गैंडों की आबादी में सुधार नई चुनौतियां लेकर आई है, जिसमें इनकी बढ़ती आबादी को समायोजित करने के लिए विस्तारित आवासों की आवश्यकता भी शामिल है। जलवायु परिवर्तन एक अतिरिक्त खतरा पैदा करता है, जिसमें लंबे मानसून के मौसम और आक्रामक प्रजातियाँ उन घास के मैदानों को नष्ट कर रही हैं जिन पर गैंडे निर्भर हैं। मानव-वन्यजीव टकराव एक और बढ़ती चिंता है क्योंकि गैंडों के आवास घनी आबादी वाले कृषि क्षेत्रों की सीमा पर हैं।

विश्व गैंडा दिवस इसलिए केवल गैंडे को बचाने का संकल्प लेने का दिन नहीं, बल्कि यह समझने का अवसर भी है कि किसी प्रजाति का अस्तित्व सुरक्षित रखने के लिए दीर्घकालिक संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है। विश्व गैंडा दिवस गैंडों को विलुप्त होने से बचाने के लिए चल रहे वैश्विक प्रयासों को महत्वपूर्ण तरीके से याद दिलाता है। असम की एक सींग वाले गैंडों को संरक्षित करने में उल्लेखनीय सफलता, विशेष रूप से काजीरंगा मॉडल के माध्यम से, वन्यजीव संरक्षण में एक प्रेरणा के रूप में खड़ी है। स्थानीय समुदायों के सहयोग के साथ-साथ राज्य की प्रतिबद्धता ने गैंडों की विलुप्त होती आबादी को बचाया है। हालांकि, अवैध शिकार, आवास क्षेत्र में कमी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां निरंतर सतर्कता और सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। आइए, इस दिन, हम गैंडों की रक्षा और भावी पीढ़ियों के लिए उनके आवासों को संरक्षित करने का फिर से संकल्प लें।(सन्दर्भ-पीआईबी,आईयूसीएन) 

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20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

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