आरक्षित वनों से आक्रामक विदेशी पौधों को हटाने पर जोर

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने आरक्षित और अन्य संरक्षित वन क्षेत्रों में आक्रामक विदेशी पौधों की प्रजातियों (आईएपीएस) के नियंत्रण तथा स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा उससे जुड़ी संस्थाएं इन आक्रामक प्रजातियों की पहचान और निगरानी कर रही हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु…

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने आरक्षित और अन्य संरक्षित वन क्षेत्रों में आक्रामक विदेशी पौधों की प्रजातियों (आईएपीएस) के नियंत्रण तथा स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा उससे जुड़ी संस्थाएं इन आक्रामक प्रजातियों की पहचान और निगरानी कर रही हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने सोमवार (10 अगस्त ) को लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) ने आक्रामक प्रजातियों की पहचान में सहायता के लिए 45 प्रमुख आक्रामक पौधों की प्रजातियों का एक अलग एल्बम तैयार किया है। एफएसआई के अनुसार, आरक्षित वन क्षेत्रों में आक्रामक पौधे बहुत घने से लेकर मध्यम घने और छिटपुट रूप में पाए जाते हैं।

राज्यवार सूची तैयार

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई) ने वन और गैर-वन क्षेत्रों में फैलने वाली संभावित आक्रामक प्रजातियों की विस्तृत राज्यवार सूची राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) को सौंपी है। इस सूची का उपयोग आक्रामक प्रजातियों के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय स्तर की योजना तैयार करने में किया जाएगा।

मंत्री ने बताया कि आरक्षित वनों और अन्य संरक्षित वन क्षेत्रों में आक्रामक विदेशी पौधों को हटाने, नियंत्रित करने तथा उनके स्थान पर स्थानीय पौधों की प्रजातियों को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन और संबंधित एजेंसियों की है। यह कार्य स्थानीय जरूरतों तथा स्वीकृत वन एवं वन्यजीव प्रबंधन योजनाओं के अनुरूप किया जाता है।

स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता

सरकार टिकाऊ वन प्रबंधन के माध्यम से स्थानीय पेड़-पौधों की प्रजातियों के संरक्षण, पुनर्जनन और संवर्धन को बढ़ावा दे रही है। राष्ट्रीय वन नीति, 1988 का उद्देश्य पर्यावरणीय स्थिरता बनाए रखना, पारिस्थितिक संतुलन बहाल करना तथा स्थानीय प्रजातियों के माध्यम से वृक्षारोपण और पुनर्जनन द्वारा वन एवं वृक्ष आवरण बढ़ाना है।

वहीं, राष्ट्रीय कार्य योजना संहिता, 2023 में इकोसिस्टम आधारित वन प्रबंधन को महत्व दिया गया है। इसके तहत आक्रामक प्रजातियों के प्रबंधन, क्षरित वन क्षेत्रों के पुनर्स्थापन, मिट्टी एवं नमी संरक्षण, जल-संभर प्रबंधन और स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप पुनर्जनन एवं बहाली कार्यों में उपयुक्त स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान है।

सरकार के अनुसार, इन उपायों से मिट्टी में नमी बनाए रखने, भूजल पुनर्भरण, जल धारण क्षमता बढ़ाने और वन पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक मजबूत बनाने में मदद मिलेगी।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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