संजय कुमार/ हमारे घर आंगन में चहकने-फुदकने वाली घरेलू गौरैया की स्थिति देश भर में अच्छी नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली की राजकीय पक्षी गौरैया की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। कुछ इलाकों में ही यह दिखती। हाल बेहाल है। खासकर शहरी इलाकों में । ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं है तो कहीं नहीं। कबूतरों का साम्राज्य फैलता ही जा रहा है। लोगों द्वारा कबूतरों को दाना पानी देने से इनकी संख्या जहां बढ़ती जा रही है, वहीं कौआ, मैना, बुलबुल, तोता सहित अन्य पक्षी जो हमारे आसपास रहती थी वे भी सिमटते जा रहे हैं।
यों तो विश्व भर में गौरैया पक्षी की आबादी में गिरावट आई है। बात दिल्ली की तो शहरीकरण, प्रदूषण,कंक्रीट के बढ़ते जंगल सहित कई कारण है जिससे इनकी संख्या में काफी कम हो गई है। हालांकि,कुछ खास इलाकों में,विशेष रूप से जहां प्राकृतिक या संरक्षित वातावरण उपलब्ध हैं, गौरैया अभी भी पाई जाती हैं। यमुना, मयूर विहार, चिड़ियाघर, किंग्सवे कैंप सहित कई इलाकों में गौरैया दिखती तो है लेकिन हर जगह नहीं। एनवायरमेंट वैरियर आकाश दत्त कि माने तो आईटीओ, सीपी, सिविक सेंटर और उसके आसपास के घरों के अंदर कई बार गौरैया को देखा गया है। दिल्ली के कुछ कम घनी आबादी वाले आवासीय इलाकों में, जहां घरों के आसपास बगीचे, पेड़-पौधे, या छोटे पार्क हैं, गौरैया की मौजूदगी देखी गई है। उदाहरण के लिए, पुरानी दिल्ली और कुछ उपनगरीय क्षेत्रों में गौरैया कभी-कभी घरों के आसपास घोंसले बनाती हैं। दिल्ली में गौरैया की घर वापसी के लिए राकेश खत्री जैसे काई लोग सक्रिय है। हालांकि देश भर में दाना-पानी रखने, कृत्रिम घोंसला (बॉक्स) और पेड़ लगने की अपील ने असर दिखाया है। गौरैया की घर वापसी देखी गई। लेकिन दिल्ली में कबूतरों की वजह से स्थिति ठीक नहीं है। कबूतरों के आतंक से परेशान लोग बालकनी में जहाँ जाल लगाने लगे हैं,वहीं कुछ लोग रोजाना उसे दाना खिलाते हैं। लेकिन घरेलू गौरैया के लिए पहल करते कम ही दिखते है। इससे घरेलू गौरैया का घरों में आना लगभग बंद हो चुका है।
गौरैया की विलुप्ति को देखते हुए 20 मार्च 2010 में विश्व गौरैया दिवस का आगाज कर उसके संरक्षण का बिगुल फूंका गया था। गौरैया संरक्षण के मद्देनजर दिल्ली सरकार ने 2012 और बिहार सरकार ने 2013 में गौरैया को राजकीय पक्षी घोषित किया। सरकारी, गैर सरकारी और निजी पहल से दिल्ली के साथ- साथ देश भर में संरक्षण मुहिम चला, जो आज भी जारी है।
दिल्ली में गौरैया की घर वापसी के लिए पहल में अहम है ‘गौरैया ग्राम’। गढ़ी मांडू वन क्षेत्र में स्थित यह दिल्ली का पहला ऐसा ग्राम है जो गौरैया को समर्पित है। ‘गौरैया ग्राम’, को दिल्ली सरकार और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने गौरैया के संरक्षण के लिए विकसित किया गया है। शहरी गढ़ी मांडू वन क्षेत्र की स्थापना वर्ष 2019 में की गई थी। यह क्षेत्र यमुना नदी के किनारे स्थित 42 एकड़ का जंगल है। यहां गौरैया को प्राकृतिक आवास तो मिलता है। यहां कृत्रिम घोंसले, फीडर बॉक्स, कीट छात्रावास, और देशी पौधों जैसे करोंदा और गौरैया के लायक पेड़ लगाए गए हैं, जो गौरैया के लिए अनुकूल वातावरण बनाते हैं।
वैसे घरेलू गौरैया इंसान के घर-आंगन या आसपास रहने वाली चिड़ियाँ है । ऐसे में शहर के अंदर जंगल में “गौरैया ग्राम” और गौरैया का रहना,थोड़ा चौंकाता है। लेकिन सही मायने में देखें तो शहरी क्षेत्र से जंगल की ओर जाना जो एक नदी के किनारे है, यह गौरैया के द्वारा ख़ुद तय किया गया है, जहाँ उसे आवास और आहार दोनों सहज मिल जाते हैं। पक्षियों के लिए नदी दाना-पानी के लिये उपयुक्त स्थान है साथ ही जंगल में उसे प्राकृतिक आहार भी मिल जाता है। वैसे ‘ गौरैया ग्राम’ में व्यवस्था भी रखी जाती है । शहर में जहाँ झाड़ीनुमा पेड़ो का क्षेत्र होता है वहाँ आराम से गौरैया आती और रहती है। वह पास के मोहल्ला/बस्ती rajesh में जाकर आहार आदि ढूँढ लेती है और रात गुज़ारने या आराम के लिये झाड़ीनुमा क्षेत्र में आ जाती है । साथ ही यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क गौरैया को संरक्षण देने का काम कर रहा है। मेट्रो से गुजरते वक्त गौरैया की उड़ान यमुना के किनारे जंगल के ऊपर कभी कभी दिख जाती है। यह क्षेत्र जैव-विविधता को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है और गौरैया जैसे पक्षियों के लिए उपयुक्त आवास प्रदान करता है। यहां प्राकृतिक वनस्पति और कीटों की उपलब्धता गौरैया को आकर्षित करती है। वहीं असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य जो दक्षिणी दिल्ली में स्थित है। यहां गौरैया सहित कई पक्षियों को सुरक्षित निवास स्थान मिलता है। वैसे दिल्ली के कुछ बड़े पार्क जैसे लोधी गार्डन, नेहरू पार्क, और इंडिया गेट के आसपास के हरे-भरे क्षेत्रों में भी कभी-कभी गौरैया देखी जाती। गौरैया की आबादी में कमी के कारण, इनका दर्शन अब पहले की तुलना में दुर्लभ हो गया है। शहरीकरण, कीटनाशकों का उपयोग, और घोंसलों के लिए उपयुक्त स्थानों की कमी ने गौरैया को दिल्ली के कई हिस्सों से लगभग गायब कर दिया है।
‘गौरैया ग्राम’ जैसे संरक्षण प्रयासों के कारण इन क्षेत्रों में गौरैया की संख्या बढ़ रही है, और यह पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है। यदि आप गौरैया देखना चाहते हैं, तो फिर से पहल करनी होगी । विशेष रूप से जिन-जिन कारणों से गौरैया गायब हुई है उन्हें ठीक करना होगा। आवासीय संकट से उबारने के लिए कृत्रिम बॉक्स और झाड़ीनुमा पेड़ लगाने होंगे साथ ही दाना-पानी की व्यवस्था करनी होगी। स्थानीय स्तर पर गौरैया संरक्षण के लिए कीटनाशक-मुक्त बगीचे भी बनाए, जो गौरैया को अपनी ओर खींचता है। बिहार सहित देश के कई हिस्सों में कई लोगों ने बालकनी, छत या घर के आसपास पेड़-पौधे लगाये तो गौरैया सहित दूसरी चिड़ियाँ आई। तो आइए गौरैया की घर वापसी के लिए प्रयासों को पंख लगाऐं, ताकि पंख फड़फड़ाते घर द्वार पर गौरैया चींचीं करती आएं।
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