शांत दिवाली : चमगादड़ों की हिफाजत के लिए ग्रामीण नहीं छोड़ते पटाखे

“तमिलनाडु के पल्लेनाहल्ली गांव में पीढ़ियों से चली आ रही अनूठी परंपरा, हजारों चमगादड़ों के संरक्षण के लिए दिवाली और दूसरे उत्सवों में भी नहीं होता आतिशबाजी का शोर; प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की मिसाल पेश कर रहे ग्रामीण” दिवाली का त्योहार रोशनी, खुशियों, मिठाइयों और आतिशबाजी के लिए जाना जाता है। लेकिन क्या किसी…

“तमिलनाडु के पल्लेनाहल्ली गांव में पीढ़ियों से चली आ रही अनूठी परंपरा, हजारों चमगादड़ों के संरक्षण के लिए दिवाली और दूसरे उत्सवों में भी नहीं होता आतिशबाजी का शोर; प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की मिसाल पेश कर रहे ग्रामीण”

दिवाली का त्योहार रोशनी, खुशियों, मिठाइयों और आतिशबाजी के लिए जाना जाता है। लेकिन क्या किसी त्योहार की खुशी पटाखों के शोर के बिना भी मनाई जा सकती है? तमिलनाडु के एक छोटे से गांव के लोगों ने इसका जवाब अपने व्यवहार से दिया है। यहां ग्रामीणों ने हजारों चमगादड़ों की सुरक्षा के लिए पटाखों को ना कह दिया है। खास बात यह है कि यह कोई सरकारी प्रतिबंध नहीं, बल्कि ग्रामीणों की अपनी संवेदनशीलता और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ी परंपरा को निभाते आ रहे है।

तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले में पलाकोड के निकट स्थित पल्लेनाहल्ली गांव में दिवाली का उत्सव दूसरे गांवों से बिल्कुल अलग होता है। यहां न पटाखों की गूंज सुनाई देती है और न ही आतिशबाजी से आसमान रोशन होता है। ग्रामीण पीढ़ियों से इस परंपरा का पालन कर रहे हैं, ताकि गांव के पुराने पेड़ों पर बसे हजारों चमगादड़ों को किसी तरह की परेशानी न हो।
पेड़ों पर बसे हैं करीब 2,000 चमगादड़
गांव में एक झील और स्थानीय मुनियप्पन मंदिर के आसपास बरगद, पीपल और इमली जैसे कई पुराने पेड़ हैं। इन्हीं पेड़ों की शाखाओं पर करीब 2,000 चमगादड़ों का बसेरा है। दिन के समय ये चमगादड़ पेड़ों पर उल्टे लटके रहते हैं और रात होते ही भोजन की तलाश में निकल जाते हैं। सुबह फिर अपने पुराने ठिकानों पर लौट आते हैं। चमगादड़ों का बसेरा अब एक पेड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि दस से अधिक पेड़ों पर फैल चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि वे चार पीढ़ियों से अधिक समय से इस परंपरा को निभाते हुए चमगादड़ों का संरक्षण कर रहे हैं। उनके लिए इन चमगादड़ों का संरक्षण सामुदायिक जीवन का हिस्सा बन चुका है।
इस परंपरा के पीछे एक स्थानीय मान्यता और पुरानी कहानी भी प्रचलित है। ग्रामीणों के अनुसार, कई पीढ़ियों पहले किसी व्यवधान के कारण चमगादड़ गांव के अपने पुराने ठिकाने से चले गए थे। इसके बाद उन्हें वापस बुलाने के लिए विशेष धार्मिक अनुष्ठान किया गया। ग्रामीणों ने प्रार्थना की और सामूहिक भोज का आयोजन किया। मान्यता है कि इसके बाद चमगादड़ दोबारा गांव के पेड़ों पर लौट आए। तब से ग्रामीणों ने उनकी सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी मान लिया। वे चमगादड़ों को केवल वन्यजीव नहीं, बल्कि अपने आराध्य मुनियप्पन से जुड़ा पवित्र जीव मानते हैं। इसीलिए गांव में दिवाली ही नहीं, दूसरे धार्मिक और सामाजिक आयोजनों के दौरान भी पटाखे नहीं छोड़ते । इस परंपरा की खास बात यह है कि बच्चों की खुशी का भी ध्यान रखा गया है। यदि बच्चे पटाखे छोड़ना चाहते हैं तो उन्हें गांव की सीमा से लगभग दो किलोमीटर दूर खेतों की ओर जाकर ऐसा करने की अनुमति है। इस तरह उत्सव मनाने की इच्छा और वन्यजीवों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया गया है।
पारिस्थितिकी में चमगादड़ों की अहम भूमिका
चमगादड़ों का संरक्षण केवल धार्मिक आस्था या परंपरा का विषय नहीं है। प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। चमगादड़ों की विभिन्न प्रजातियां अलग-अलग तरह से पर्यावरण को लाभ पहुंचाती हैं। फल खाने वाले चमगादड़ फलों के बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाते हैं, जबकि पराग और मकरंद पर निर्भर रहने वाली प्रजातियां फूलों के परागण में मदद करती हैं। वहीं कीट खाने वाले चमगादड़ कई प्रकार के कीटों की संख्या नियंत्रित करने में योगदान देते हैं।

भारत के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की पर्यावरण लेखांकन से जुड़ी अध्ययन सामग्री में भी चमगादड़ों की परागण और बीज प्रसार में भूमिका को रेखांकित किया गया है। विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय जंगलों के पुनर्जनन और वनस्पतियों की विविधता बनाए रखने में फलाहारी चमगादड़ों का योगदान महत्वपूर्ण है।
वन्यजीव संरक्षण का अनूठा संदेश
आज जब शहरीकरण, पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने से वन्यजीवों के सामने अनेक चुनौतियां हैं, ऐसे में पल्लेनाहल्ली गांव की परंपरा विशेष महत्व रखती है। चमगादड़ों के प्राकृतिक ठिकानों की रक्षा करना उनकी आबादी और स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण के लिए जरूरी है। तेज आवाज और मानवीय गतिविधियों से उनके बसेरों में व्यवधान पैदा हो सकता है। इसलिए उनके आवास के आसपास शोर और आतिशबाजी से बचना संरक्षण की दिशा में एक व्यावहारिक कदम है। पल्लेनाहल्ली गांव की कहानी यह भी बताती है कि वन्यजीव संरक्षण के लिए हमेशा बड़े सरकारी अभियानों या भारी निवेश की जरूरत नहीं होती। कई बार स्थानीय समुदाय की इच्छाशक्ति, परंपरा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी बड़ा बदलाव ला सकती है। पल्लेनाहल्ली के ग्रामीणों ने अपनी धार्मिक आस्था को प्रकृति के संरक्षण से जोड़कर एक ऐसी मिसाल कायम की है, जिससे दूसरे समुदाय भी प्रेरणा ले सकते हैं। उनकी शांत दिवाली का संदेश बेहद सरल, लेकिन महत्वपूर्ण है—त्योहारों की खुशियां केवल इंसानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इस धरती पर रहने वाले दूसरे जीव-जंतुओं को भी सुरक्षित और शांतिपूर्ण जीवन का अधिकार है।

तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले में पलाकोड के निकट स्थित पल्लेनाहल्ली गांव ने एक जीव के संरक्षण के लिए जो मिसाल कायम की है उसका अनुपालन देश भर में किया जा सकता है। जिस कदर प्रदूष्ण ने जीना मुहाल कर रखा है उसे देखते हुए हमें पहल करनी चाहिए । प्रतिबन्ध के बावजूद आम पटाखे बिक रहे हैं जबकि ग्रीन पटाखों को ही मंजूरी मिली हैं । पटाखों से केवल पशु-पक्षियों को नुकसान नहीं पहुंचता बल्कि इन्सान का भी दम निकलता हैं ।

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 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

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उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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