विजयवाड़ा, 5 नवंबर 2026 / भारत के जलपुरुष डॉ. राजेंद्र सिंह और पर्यावरण कार्यकर्ता बोलिशेट्टी सत्यनारायण ने आह्वान किया है कि विकास ऐसा होना चाहिए जो लोगों के जीवन स्तर को बढ़ाए, न कि उनके भविष्य को खतरे में डाले। जंगलों, नदियों, तालाबों, कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करके हासिल किया गया विकास वास्तविक प्रगति नहीं है। विजयवाड़ा में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि 2026 के पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (EPI) में 177 देशों में भारत का 176वें स्थान पर रहना हम सभी के लिए एक चेतावनी है। यह इस बात की चेतावनी है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों का समन्वय के साथ होना आवश्यक है। उन्होंने विस्तार से विकास के नाम पर हो रहे प्रकृति के लिए विनाशकारी पहलुओं को रेखांकित किया …..
1. विशाखापट्टनम डेटा सेंटर: क्या निवेश के लिए पर्यावरण को दांव पर लगाना सही है?
विशाखापट्टनम में प्रस्तावित 1,000 मेगावाट से अधिक के गूगल-अदानी डेटा सेंटर प्रोजेक्ट पर सरकार को जनता के सामने कई सवालों के जवाब देने हैं:
* लगभग ₹22,002 करोड़ के प्रोत्साहन और सैकड़ों एकड़ भूमि के आवंटन के बदले राज्य को वास्तविक लाभ क्या है? केवल 500 नौकरियां और पर्यावरण का विनाश!
* सिंहाचलम देवस्थानम की 160 एकड़ भूमि के आवंटन में पारदर्शिता कहाँ है? सरकार 30 साल के समझौते की बात कर रही है, जबकि कंपनी की ओर से दायर हलफनामे में लीज 11 साल की बताई गई है, जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है। असली लीज दस्तावेजों को जनता के सामने रखा जाना चाहिए।
* कंबालकोंडा पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) के प्रतिबंधित 1 किलोमीटर के दायरे में निर्माण के कारण मुडासर्लोवा जलाशय और आसपास के जल स्रोतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। आवश्यक केंद्रीय पर्यावरण और वन स्वीकृतियों के बिना निर्मित डेटा सेंटर केवल कानूनी उल्लंघन ही नहीं, बल्कि एक आपराधिक कृत्य भी है।
4 नवंबर 2026 को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से इन मुद्दों पर आपत्तियां उठाई गईं। कंपनी ने कहा है कि उसका काम लागू कानूनों और स्वीकृतियों के अनुसार ही चल रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह परियोजना अंतिम फैसले के अधीन है और प्रतिवादी कंपनी अपने स्वयं के जोखिम पर काम जारी रख रही है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई में डॉ. राजेंद्र सिंह के विचारों को सुनने पर भी सहमति व्यक्त की है।
डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा कि निवेश और प्रोत्साहन के लिए विशाखापट्टनम के पानी, हरियाली और पर्यावरण सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जाना चाहिए।
2. अमरावती: पर्यावरण स्वीकृतियों का उल्लंघन राज्य के लिए नुकसानदेह!
आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती का निर्माण राज्य के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार द्वारा प्राप्त पर्यावरण मंजूरी SEIAA/AP/GTN-151/2015, दिनांक 09.10.2026 के अनुसार पृष्ठ 15 पर: “9) शहर की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रस्तावक को शहरी कृषि को बढ़ावा देना चाहिए और प्रतिबद्धता के अनुसार इस उद्देश्य के लिए जहां भी संभव हो, उच्च मूल्य वाली कृषि भूमि आरक्षित करनी चाहिए। प्रतिबद्धता के अनुसार जैव विविधता से समृद्ध कृष्णा नदी के समानांतर 2 से 3 किमी चौड़ी पट्टी का उपयोग केवल कृषि और ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए ही किया जाना चाहिए।”
इन शर्तों और सीमाओं का अमरावती में पूरी तरह से उल्लंघन हो रहा है, जो कि अवैध है। जल प्रवाह मार्गों, बाढ़ के खतरों, जल संसाधनों, मिट्टी की प्रकृति और पारिस्थितिक संतुलन जैसे पहलुओं की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
यदि पर्यावरण स्वीकृतियों के दायरे से बाहर या उनकी शर्तों का उल्लंघन करके निर्माण किया जाता है, तो भविष्य में बाढ़, पर्यावरणीय क्षति, कानूनी समस्याएं और निर्माण कार्य रुकने जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। अंततः इसका भारी वित्तीय बोझ राज्य के खजाने यानी जनता पर ही पड़ेगा।
अमरावती का निर्माण तेजी से होना जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह कानूनी रूप से और पर्यावरण सुरक्षा के साथ हो। यदि पर्यावरण स्वीकृतियों का उल्लंघन करके राजधानी का निर्माण किया जाता है, तो राज्य को भारी नुकसान होगा।
3. चिंतालापुडी-रेचर्ला UCG: उपजाऊ भूमि के नीचे कोयला गैसीकरण क्यों?
जब पूरी दुनिया स्वच्छ ऊर्जा और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर कदम बढ़ा रही है, तब चिंतालापुडी-रेचर्ला में उपजाऊ कृषि भूमि के नीचे से कोयला निकालने की क्या आवश्यकता है? रिलायंस से संबंधित चिंतालापुडी A1 और रेचर्ला कोयला ब्लॉक में प्रस्तावित भूमिगत कोयला गैसीकरण (UCG) परियोजना की स्वतंत्र वैज्ञानिक और पर्यावरणीय समीक्षा की जानी चाहिए। क्वींसलैंड में ‘लिंक एनर्जी’ का अनुभव हमें चेतावनी देता है कि पर्यावरणीय जोखिमों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले सरकार को:
* स्वतंत्र वैज्ञानिक और पर्यावरणीय समीक्षा करानी चाहिए।
* उपयोग की जाने वाली तकनीक, रसायनों, भूजल और मिट्टी पर पड़ने वाले प्रभावों को उजागर करना चाहिए।
* किसानों और ग्रामीणों के साथ सार्थक परामर्श करना चाहिए।
* 8,700 एकड़ उपजाऊ भूमि, किसानों की आजीविका और गांवों के शांत जीवन की रक्षा करनी चाहिए।
जनता की भूमि, पानी और आजीविका पर पूर्व वैज्ञानिक जांच के बिना प्रयोग नहीं किए जाने चाहिए।
डॉ. राजेंद्र सिंह की मुख्य मांगें:
* विशाखापट्टनम डेटा सेंटर से संबंधित पर्यावरण, वन, जल उपयोग स्वीकृतियां, भूमि आवंटन और लीज समझौते जनता के सामने रखे जाएं। विकास कानून के दायरे में होना चाहिए।
* कंबालकोंडा ESZ, मुडासर्लोवा जलाशय और आसपास के जल स्रोतों पर परियोजना के प्रभाव की स्वतंत्र समीक्षा की जाए।
* सिंहाचलम देवस्थानम की जमीनों के आवंटन में पारदर्शिता और कानूनी वैधता सुनिश्चित की जाए।
* अमरावती में कृष्णा नदी के समानांतर 2 से 3 किमी चौड़ी भूमि का उपयोग केवल कृषि और ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए ही हो, और यह पर्यावरण स्वीकृतियों तथा शर्तों के अधीन ही किया जाए। उल्लंघनों की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए; सरकार को कृषि भूमि को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं है।
* चिंतालापुडी-रेचर्ला UCG परियोजना पर पायलट प्रोजेक्ट से पहले स्वतंत्र समीक्षा की जाए और 8,700 एकड़ कृषि भूमि, किसानों और गांवों की रक्षा की जाए।
* जनता की भागीदारी, पर्यावरण संरक्षण और भावी पीढ़ियों के हितों को प्राथमिकता देने वाली विकास नीति को लागू किया जाए।
जनता से डॉ. राजेंद्र सिंह की अपील:
हमारा संघर्ष विकास के खिलाफ नहीं है। हम पर्यावरण कानूनों का सम्मान करते हुए, प्रकृति की रक्षा करते हुए और लोगों को वास्तविक लाभ पहुंचाने वाले विकास का पूर्ण समर्थन करते हैं। विशाखापट्टनम में जल संसाधनों और जंगलों की रक्षा होनी चाहिए। अमरावती में राजधानी का निर्माण पर्यावरण स्वीकृतियों के अनुसार होना चाहिए। चिंतालापुडी-रेचर्ला में उपजाऊ कृषि भूमि और ग्रामीण आजीविका की रक्षा होनी चाहिए।
प्रकृति ने हमें जो पानी, जमीन, जंगल और जैव विविधता दी है, वह केवल हमारी संपत्ति नहीं है—यह एक ऐसी विरासत है जिसे हमें भावी पीढ़ियों को सौंपना है। प्रकृति अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकती। प्रकृति की ओर से आवाज हमें ही उठानी होगी! पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास चाहिए, प्रकृति के विनाश के साथ विकास नहीं! (जलपुरुष डॉ. राजेंद्र सिंह के फेसबुक वाल से )














