गौरैया की संख्या में कमी के पीछे कई कारण

मोबाइल फोन टावरों की भूमिका नहीं संजय कुमार / गौरैया की संख्या में कमी के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। इनमें मोबाइल टावर से निकलने वाली रेडियो तरंगों को भी एक संभावित कारण माना जाता है। हालांकि, यह कहना कि गौरैया की संख्या में गिरावट का मुख्य या निर्णायक कारण मोबाइल टावर ही हैं,…

मोबाइल फोन टावरों की भूमिका नहीं

संजय कुमार / गौरैया की संख्या में कमी के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। इनमें मोबाइल टावर से निकलने वाली रेडियो तरंगों को भी एक संभावित कारण माना जाता है। हालांकि, यह कहना कि गौरैया की संख्या में गिरावट का मुख्य या निर्णायक कारण मोबाइल टावर ही हैं, अभी वैज्ञानिक रूप से अंतिम रूप से सिद्ध नहीं हुआ है। इस विषय पर शोध और अध्ययन जारी हैं तथा अलग-अलग अध्ययनों के निष्कर्षों में भी एकरूपता नहीं है।

गौरैया की आबादी में गिरावट के इतिहास को देखें तो एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। कई क्षेत्रों में गौरैया की संख्या में गिरावट उस दौर में भी दर्ज की गई, जब मोबाइल फोन और मोबाइल टावर अस्तित्व में ही नहीं थे। 1950 से 1970 के बीच अनेक स्थानों पर गौरैया की संख्या अपेक्षाकृत स्थिर या बढ़ती हुई देखी गई, जबकि 1970 से 1990 के बीच कई क्षेत्रों में इनकी संख्या में गिरावट की शुरुआत हुई। मोबाइल संचार तकनीक का व्यापक विस्तार इसके काफी बाद हुआ। इसलिए गौरैया की संख्या में कमी को केवल मोबाइल टावर से जोड़ना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

1950-70: गौरैया बढ़ी क्यों?

हरित क्रांति से पहले खेतों में घोड़े, बैल, खलिहान, खुले दाने, गोबर के ढेर थे। घर कच्चे थे, खपरैल वाले, रोशनदान वाले। दाना बिखरता था, कीड़े बहुत थे। इसलिए गौरैया भरपूर थी।

1970-90: गिरावट शुरू – जब मोबाइल था ही नहीं

ब्रिटेन में 1970 के दशक से ही शहरों में गौरैया 60% तक गिर गई, ग्रामीण क्षेत्रों में 47% गिरी। लंदन ने 1994 से 2001 के बीच 70% गौरैया खो दी। भारत में भी इसी समय सीमेंट के मकान, पैकेट वाला अनाज, और कीटनाशक आ गए।

जर्मनी के 1850-2000 के शोध में पाया गया कि गौरैया की गिरावट 1970 से बहुत पहले शुरू हो गई थी, 20वीं सदी की पहली छमाही से ही 50% आबादी घट गई।

मोबाइल फोन टावरों की कोई भूमिका नहीं

मोबाइल फोन टावर से निकलने वाले रेडिएशन को भी इसकी संख्या में कमी करने वाला एक बड़ा कारक माना जाता रहा है। लेकिन स्टेट ऑफ इंडियंस बर्ड्स 2020- रेंज, ट्रेंड्स और कंजर्वेशन स्टेट्स  ने अपने  रिपोर्ट के पेज संख्या छह पर साफ-साफ कहा है कि अनाज और आवासीय संकट से गौरैया की संख्या में कमी के तथ्य जरूर दिखते हैं लेकिन मोबाइल फोन टावर का जो तर्क दिया जाता रहा है उसे लेकर कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला है, जिससे यह पता चले कि रेडिएश्न से गौरैया के प्रजनन पर प्रभाव पड़ता हो। यानि यह भ्रम है  कि  मोबाइल फोन टावर से गौरैया के प्रजनन को खतरा होता है। गौरैया की संख्या को कम करने में मोबाइल फोन टावरों की कोई भूमिका नहीं है। इसे लेकर एक रिपोर्ट पहले भी आ चुकी है। विश्व भर के विशेषज्ञों द्वारा 88 पेज की एक रिपोर्ट-‘रिपोर्ट ऑन पॉसिबल इम्पक्ट्स ऑफ़ कम्युनिकेशन टावर्स ऑन वाइल्डलाइफ इन्क्लुडिंग बर्ड्स एंड बी’ में साफ़ कहा गया है कि अब तक के परिणाम में यह प्रभावी खतरा नहीं हैं। वहीँ  कुछ संस्था अभी भी इसे दोषी मानती है।

संख्या में कमी के पीछे कई कारण

गौरैया के घटने के पीछे उसके प्राकृतिक आवास में बदलाव, पुराने मकानों और छतों में घोंसले बनाने की जगहों का कम होना, शहरीकरण, पेड़ों और झाड़ियों की कमी, भोजन के प्राकृतिक स्रोतों में कमी, कीटनाशकों का बढ़ता इस्तेमाल, खुले अनाज और दाने की उपलब्धता में कमी तथा प्रदूषण जैसे कई कारणों की भूमिका हो सकती है। आधुनिक भवनों में चिकनी और बंद दीवारों तथा कांच के बढ़ते इस्तेमाल ने भी गौरैया के लिए सुरक्षित घोंसले बनाने की जगहें सीमित कर दी हैं।

खास बात यह है कि गौरैया इंसानों के आसपास रहने वाली पक्षी है। गांवों, कस्बों और पुराने शहरों में उसे घरों की छतों, रोशनदानों, खपरैल, लकड़ी की छतों और दीवारों की छोटी दरारों में आसानी से घोंसला बनाने की जगह मिल जाती थी। घरों के आसपास अनाज के दाने, रसोई से निकलने वाले खाद्य कण और छोटे कीट उसके भोजन का हिस्सा थे। जैसे-जैसे पारंपरिक मकान कम हुए और शहरी जीवनशैली बदली, गौरैया के रहने और भोजन जुटाने की परिस्थितियां भी बदलती गईं।

इसलिए मोबाइल टावर को लेकर किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय गौरैया के घटने के सभी संभावित कारणों को साथ रखकर अध्ययन करना जरूरी है। मोबाइल टावर और रेडियोफ्रीक्वेंसी विकिरण के संभावित प्रभाव पर वैज्ञानिक शोध को जारी रखा जाना चाहिए, लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों को देखते हुए इसे गौरैया की संख्या में गिरावट का एकमात्र कारण बताना सही नहीं होगा।

गौरैया के संरक्षण के लिए सबसे जरूरी है कि उसके रहने, घोंसला बनाने और भोजन प्राप्त करने के प्राकृतिक अवसरों को फिर से बढ़ाया जाए। घरों और भवनों में कृत्रिम घोंसले लगाए जाएं, स्थानीय पेड़-पौधे और झाड़ियां लगाई जाएं, कीटनाशकों का अनावश्यक इस्तेमाल कम किया जाए और पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था की जाए। इससे गौरैया को शहरों और गांवों में फिर से सुरक्षित वातावरण मिल सकता है।

About the Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में

यह वेबसाइट पूरी तरह से अवैतनिक,जनहित और सामाजिक सरोकार को समर्पित है। हमारा मंच किसी व्यक्ति या संगठन के लाभ के लिए नहीं, बल्कि केवल गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की आवाज बनने के लिए है।

हमें आप लिख सकते हैं …आप हमें  📩 ईमेल करें: ilovesparrow68@gmail.com

🐦 आपकी भागीदारी जरूरी है: अगर आपके पास गौरैया और पर्यावरण संरक्षण संरक्षण से जुड़े अनुभव, प्रेरक कहानियाँ, कविताएँ, गीत या शोधपरक आलेख हैं, तो हमें ज़रूर भेजें।

www.ilovesparrow.com वेबसाईट का उद्देश्य साफ़ है घर -घर गौरैया संरक्षण की पहल हो..साथ ही पर्यावरण का भी संरक्षण हो।

सम्पादक : डॉ लीना, सहायक सम्पादक : निशांत रंजन