‘इंटरनेशनल रेड पांडा डे’ : अद्भुत छोटा स्तनधारी जीव

पटना, 19 सितंबर 2026/ पटना यूनिवर्सिटी, पटना के ज़ूलॉजी (प्राणी विज्ञान) विभाग में आज ‘इंटरनेशनल रेड पांडा डे’ मनाया गया। 🐼 हर साल सितंबर के तीसरे शनिवार को ‘इंटरनेशनल रेड पांडा डे’ मनाया जाता है। यह दिन एशिया के सबसे अनोखे और कम जाने-पहचाने स्तनधारी जीवों में से एक, रेड पांडा के बारे में जागरूकता…

पटना, 19 सितंबर 2026/ पटना यूनिवर्सिटी, पटना के ज़ूलॉजी (प्राणी विज्ञान) विभाग में आज ‘इंटरनेशनल रेड पांडा डे’ मनाया गया। 🐼 हर साल सितंबर के तीसरे शनिवार को ‘इंटरनेशनल रेड पांडा डे’ मनाया जाता है। यह दिन एशिया के सबसे अनोखे और कम जाने-पहचाने स्तनधारी जीवों में से एक, रेड पांडा के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। इसकी शुरुआत 2010 में ‘रेड पांडा नेटवर्क’ ने की थी और पहला ‘इंटरनेशनल रेड पांडा डे’ 18 सितंबर 2010 को मनाया गया था। तब से यह एक वैश्विक जागरूकता कार्यक्रम बन गया है, जिसमें स्कूल, चिड़ियाघर, संरक्षण संगठन और वन्यजीव प्रेमी शामिल होते हैं।


रेड पांडा — एक अद्भुत छोटा स्तनधारी जीव
रेड पांडा (Ailurus fulgens) एक छोटा, पेड़ों पर रहने वाला स्तनधारी जीव है जो पूर्वी हिमालय और दक्षिण-पश्चिमी चीन का मूल निवासी है। यह नेपाल, भूटान, भारत, म्यांमार और चीन जैसे देशों में पाया जाता है। यह मुख्य रूप से ठंडे, ऊंचे पहाड़ी इलाकों के समशीतोष्ण जंगलों में रहता है। अपने नाम के बावजूद, रेड पांडा ‘जायंट पांडा’ का करीबी रिश्तेदार नहीं है। यह ‘एल्यूरिडे’ (Ailuridae) परिवार का एकमात्र जीवित सदस्य है, जो इसे स्तनधारी जीवों के परिवार में एक अनोखी शाखा बनाता है।
क्या आप जानते हैं?

  • इसकी लाल-भूरे रंग की खाल जंगल की वनस्पतियों के बीच इसे आसानी से छिपने (कैमफ्लाज) में मदद करती है।
  • इसकी लंबी, घनी और छल्लेदार पूंछ चढ़ते समय संतुलन बनाने में मदद करती है और ठंड के मौसम में गर्मी देती है।
  • रेड पांडा पेड़ों पर चढ़ने में माहिर होते हैं और उनके पंजे आंशिक रूप से अंदर-बाहर हो सकने वाले (semi-retractable) होते हैं।
  • बांस इनके भोजन का मुख्य हिस्सा है, हालांकि ये फल, बेरी, कीड़े-मकोड़े और अन्य छोटी चीजें भी खा सकते हैं।
  • ये आम तौर पर अकेले रहते हैं और खासकर सुबह और शाम के समय ज़्यादा सक्रिय होते हैं।
  • इनका प्राकृतिक आवास स्वस्थ हिमालयी जंगलों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
    इंटरनेशनल रेड पांडा डे’ क्यों महत्वपूर्ण है?
    रेड पांडा को आवास के नुकसान और बंटवारे, अवैध शिकार और इंसानी गतिविधियों से गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है। यह प्रजाति वर्तमान में IUCN की ‘रेड लिस्ट’ में ‘वल्नरेबल’ (खतरे की आशंका वाली) श्रेणी में शामिल है, जो इनके जंगली आवास के निरंतर संरक्षण और सुरक्षा की आवश्यकता को उजागर करती है।
    ‘इंटरनेशनल रेड पांडा डे’ हमें याद दिलाता है कि किसी प्रजाति की सुरक्षा का मतलब है उससे जुड़े जंगलों, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा करना। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता नवीन कुमार थे और डॉ. गोपाल शर्मा ने कार्यक्रम की थीम पेश की। ज़ूलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. पी.के. खान ने अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर प्रो. शाहला यास्मीन, प्रो. जी.बी. चंद, प्रो. दिलीप कुमार और प्रो. गजेंद्र कुमार आज़ाद मौजूद थे। पटना साइंस कॉलेज के ज़ूलॉजी विभाग के प्रमुख (HOD) ने धन्यवाद प्रस्ताव पेश किया।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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