धारदार मांझे की चपेट में रोज घायल हो रहे दर्जनों परिंदे इन्सान भी आ रहे हैं चपेटे में
नई दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस पर पतंग उड़ाने की परंपरा भले ही दिल्ली और दिल्ली एनसीआर के आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों का नजारा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता हो, लेकिन पतंगबाजी का यह शौक पक्षियों के साथ साथ इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। खासकर प्रतिबंधित और धारदार मांझे की चपेट में आकर बड़ी संख्या में पक्षी और लोग घायल हो रहे हैं। जहाँ इंसान की भी मौत हो रही है वहीँ कई पक्षियों के पंख, पैर और गर्दन मांझे में उलझकर कट रहे जबकि गंभीर रूप से घायल पक्षियों की इलाज के दौरान मौत भी हो रही है। प्रतिबंधित धारदार मांझे से नुकसान और जान लेवा पतंगबाजी को लेकर दिल्ली मेट्रो ट्रेन में रोजाना जागरूकता अभियान चलाये जाने के बावजूद धारदार मांझे वाली पतंगबाजी जारी है । हालाँकि मीडिया,सरकार,गैर सरकारी संगठन के स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
पुरानी दिल्ली स्थित दिगंबर जैन लाल मंदिर के धर्मार्थ चिकित्सालय में इन दिनों मांझे से घायल पक्षियों की संख्या अचानक बढ़ गई है। चिकित्सालय के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. हरअवतार सिंह के मुताबिक, स्वतंत्रता दिवस के आसपास रोजाना करीब 30 से 40 घायल पक्षी इलाज के लिए लाए जा रहे हैं। बीते दो दिनों में ही मांझे की चपेट में आने से घायल करीब 100 पक्षियों को चिकित्सालय पहुंचाया गया। इनमें चील, तोता, कबूतर और कौवा जैसे पक्षी शामिल हैं। एक ग्रे हॉर्नबिल भी गंभीर रूप से घायल अवस्था में अस्पताल लाया गया।
गर्दन और पंखों पर सबसे ज्यादा चोट

मांझे में फंसने के बाद पक्षियों को अक्सर गंभीर चोटें आती हैं। उड़ान के दौरान अचानक धारदार मांझा वाला धागा सामने आने से उनके पंख और पैर उसमें उलझ जाते हैं। कई बार धारदार मांझा गर्दन या पंखों को काट देता है। इससे पक्षी जमीन पर गिर जाते हैं और दोबारा उड़ नहीं पाते। कुछ मामलों में पक्षियों के शरीर से इतना अधिक रक्तस्राव हो जाता है कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो जाती है। चिकित्सकों के अनुसार, मांझे से घायल पक्षियों के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती रक्तस्राव रोकना और कटे हुए अंगों को संक्रमण से बचाना होती है। गंभीर रूप से घायल पक्षियों को तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है। समय पर मदद नहीं मिलने पर उनके बचने की संभावना कम हो जाती है।
सिर्फ पक्षी ही नहीं, इंसानों के लिए भी खतरा
धारदार मांझे का खतरा केवल पक्षियों तक सीमित नहीं है। सड़क पर चलने वाले दोपहिया वाहन चालक और राहगीर भी इसके शिकार हो सकते हैं। कई बार सड़क, बिजली के तारों और पेड़ों के बीच फंसा मांझा दिखाई नहीं देता और वाहन चालक इसकी चपेट में आ जाते हैं। गर्दन या चेहरे पर मांझा लगने से गंभीर चोट लगने का खतरा बना रहता है। 15 अगस्त को एनएच 9 पर एक मोटर साइकिल सवार धारदार मांझे वाले धागे की चपेट आया और उसकी मौत हो गयी। विशेषज्ञों की माने तो पतंग उड़ाने के दौरान सामान्य सूती धागे का इस्तेमाल भी सावधानी से किया जाना चाहिए और बिजली की लाइनों, पेड़ों तथा पक्षियों के अधिक आवागमन वाले क्षेत्रों से दूर पतंग उड़ानी चाहिए। प्रतिबंधित, कांच या धातु से लेपित तथा सिंथेटिक धारदार मांझे का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए।
इलाज के बाद भी कई पक्षियों की उड़ान मुश्किल
मांझे से घायल पक्षियों को उपचार मिलने के बाद भी उनकी मुश्किल खत्म नहीं होती। जिन पक्षियों के पंखों में गहरी चोट आती है या नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, उनके लिए दोबारा सामान्य रूप से उड़ना कठिन हो सकता है। कुछ पक्षियों को लंबे समय तक निगरानी और देखभाल की जरूरत पड़ती है। ऐसे में पशु चिकित्सकों और पक्षी बचाव कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
पतंग उड़ाएं, लेकिन सावधानी के साथ
स्वतंत्रता दिवस पर पतंग उड़ाने की परंपरा और उत्साह को बनाए रखते हुए पक्षियों की सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है। पतंग उड़ाने के लिए सुरक्षित धागे का इस्तेमाल, सुबह और शाम पक्षियों की अधिक सक्रियता वाले समय में पतंगबाजी से बचना तथा घायल पक्षी दिखाई देने पर स्वयं मांझा खींचने के बजाय प्रशिक्षित बचावकर्मियों या पशु चिकित्सकों की मदद लेना जरूरी है।
पक्षी हमारे शहरी पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। आसमान में उड़ती पतंग आजादी और उत्सव का प्रतीक हो सकती है, लेकिन उसकी डोर किसी परिंदे की जिंदगी की डोर न बन जाए, इसके लिए पतंग उड़ाने वालों को जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ त्योहार मनाने की जरूरत है। (साभार -दैनिक हिंदुस्तान,नई दिल्ली 17-8-26 ,फोटो AI-chatgpt)















