संजय कुमार / पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली में गौरैया और पर्यावरण अहम मुद्दा है। विश्व भर में गौरैया की विलुप्त का सवाल उठता रहता है तो वही पर्यावरण के ऊपर बढ़ते खतरे ने विश्व को चिंतित कर रखा है। प्रकृति का फेंफड़ा यानी पेड़ों की बेइंतहा कटाई और उजड़ते वन क्षेत्र से जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या विकराल रूप ले चुकी है। पारितंत्र (ecosystem) या पारिस्थितिक तंत्र (ecological system) एक प्राकृतिक इकाई है। इसमें एक क्षेत्र विशेष के सभी जीवधारी यानी पौधे, जीव-जन्तु एवं अणुजीव शामिल हैं। ये अपने अजैव पर्यावरण के साथ अंतर्क्रिया करके एक सम्पूर्ण जैविक इकाई बनाते हैं। इस प्रकार पारितंत्र एक-दूसरे पर आश्रित अवयवों की एक इकाई है,कड़ी है। पारितंत्र में आमतौर पर अनेक खाद्य जाल बनाते हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर इन जीवों के आश्रित होने और ऊर्जा के प्रवाह को दिखाते हैं। इसमें वे अपने भोजन, आवास एवं अन्य जैविक क्रियाओं के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
देखा जाए तो आज पर्यावरण के आवरण से जुड़े घटकों जल, जमीन, वायु, पेड़ आदि की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। ऐसे में स्वभाविक है विश्व भर में चर्चा तो होगी ही। तभी तो संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2021 को ‘पारिस्थितिकी तंत्र में बहाली’ को विषय बनाया है यानी इकोलॉजिकल सिस्टम जो बिगड़ चुका है उसे दुरुस्त किया जाए। इकोसिस्टम को फिर से बहाल किया जाए, हालांकि इतना आसान नहीं है लेकिन लोगों को जागरूक कर बिगड़ते हालात पर काबू पाया जा सकता है।
इस इकोसिस्टम में से सभी घटक एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन इंसानों ने विकास और विलासिता की अंधीधुंध यात्रा में पर्यावरण के बिगड़ते मिजाज को और बिगाड़ दिया है। पारिस्थितिकी तंत्र को तार तार कर दिया है। बात गौरैया और पर्यावरण की करें तो पारिस्थितिकी तंत्र के लिये औरों की तरह गौरैया की भी भूमिका अहम है। गौरैया हमारा मित्र है। घरेलू पक्षी है जो पर्यावरण का एक संरक्षक के रूप में कार्य करता है।
पर्यावरण का बिगड़ना और गौरैया का अस्तित्व का खतरे में पड़ना गंभीर सवाल है। शहर की तो बात दूर गांव-गांव से नन्ही सी प्यारी चिरैया गौरैया की जान आफत में है या फिर खत्म हो रही है या एक इलाके को छोड़ दूसरे में चली जा रही है। खासकर मेट्रो शहरों में खासा प्रभाव देखने को मिलता है। प्यारी सी नन्ही गौरैया के ऊपर बिगड़ते पर्यावरण की मार पड़ी है। इस वजह से एक शहर में दिखती है तो दूसरे शहर में नहीं। एक गांव में दिखती है तो दूसरे गांव में नहीं। एक शहर के एक इलाके में दिखती है तो ही उसी शहर के दूसरे इलाके में नहीं। अजीब सी तस्वीर है जो चिंतित करती है। गौरैया को घरेलू पक्षी कहा जाता है। जहां-जहां इंसान गया, वहां-वहां यह गौरैया गई और इंसानों के आसपास अपना बसेरा बनाया है।
पर्यावरण के घटकों में जल- भूमि- पेड़- पौधे आदि पर बढ़ते खतरे से इंसानों के साथ-साथ पशु और पक्षियों को भी खतरे में डाल दिया है। जल प्रदूषित होते जा रहे हैं। तालाब – पोखर और नदियां सूख रही हैं। खेत- खलिहान का स्वरूप बदल रहा है। खेतों में बेइंतहा कीटनाशक के प्रयोग ने गौरैया सहित कई चिड़ियों को खतरे में डाल दिया है। देखा जाए तो गौरैया पर्यावरण के बहुत नजदीक है। खेत खलिहान में जो फसलें होती है उन फसलों पर लगने वाले कीड़ों को यह अपने बच्चों को खिलाती है, लेकिन अब बड़ी मुश्किल से बच्चे को कीड़े खिला पाती है। कीड़े नहीं मिल पाने से बच्चे दम तोड़ देते हैं। हर और कंक्रीट का जंगल, पेड़ों की लगातार कटाई से आवासीय और आहार की समस्या गौरैया सहित अन्य पक्षियों पर साफ दिखती है। यह अलग बात है कि विकास के लिए कटते पेड़ के एवज में पौधारोपण किया जा रहा है, लेकिन एक सोशल ऑडिट होनी चाहिए। देखा जाना चाहिए कि पक्षियों के रैन बसेरों को हमने कहां कहां उजाड़ दिया। उजाड़ा तो, उनकी व्यवस्था क्यों की या नहीं ?
वहीं एक अहम सवाल है बाग-बगीचे के कंसेप्ट को भी खत्म किया जा रहा है। पहले हर घर के आगे पीछे बाग बगीचे का कंसेप्ट हुआ करता था। फलदार वृक्ष पौधे लगाए जाते थे लेकिन यह सब अब नहीं के बराबर दिखते हैं। भूमि का हमने जमकर दोहन किया है। बाग बगीचे को उजाड़ कर कंक्रीट की इमारत बना दी है। सड़क निर्माण के दौरान आसपास की जमीन को सीमेंट से पाट दिया है। पहले बारिश के समय या घरों से निकलने वाले पानी के जमा होने से पशु पक्षी अपनी प्यास बुझाया करते थे, आज उन्हें भटकना पड़ता है। साफ है पारिस्थितिकी तंत्र से हमने छेड-छाड़ की ।
‘पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली’ नारे के साथ पर्यावरण को बचाने की मुहिम वर्ष 2021 का विषय है। जिस तरह से इंसानों ने लिए पर्यावरण बहुत मायने रखता है, उसी तरह से पक्षियों के लिए भी। लेकिन इंसानों ने अपनी जीवन शैली से पर्यावरण और गौरैया दोनों को बहुत नुकसान पहुंचाया है। इंसानों ने खाध्य श्रृंखला को प्रभावित किया है, जिससे पर्यावरण पूरी तरह असंतुलित हो गई है। ध्रुवों पर बर्फ के बड़े पहाड़ों का टूटना, वैश्विक तापमान का बढ़ना, ताऊते या यास जैसे तूफानों व चक्रवातओं का आना, यह सब प्राकृतिक असंतुलन की वजह से ही तो हो रहा है।
गौरैया के लिए बढ़ते प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण ने पलायन के लिए मजबूर कर दिया। गांवों से शहरों में बनते कंक्रीट के जंगल ने गौरैया से उसका आशियाना छीन लिया है। वहीं कीटनाशकों का प्रयोग से उसके आहार पर आफत आ गई है। ऐसे में इंसान के साथ-साथ गौरैया और पर्यावरण को भी बचाना होगा। गौरैया संरक्षण पर काम करने वाले गुजरात से स्पैरोमैन जगत कीनखाबवाला की माने तो जंगलों की कटाई कर कंक्रीट के जंगल के निर्माण ने गौरैया को उसके प्राकृतिक आवास से छिन्न–भिन्न कर दिया है। यह हमारे बीच रहने वाला पक्षी है। जहां तक बिगड़ते पर्यावरण का सवाल है तो पेड़ केवल ऑक्सीजन के लिए ही नहीं बल्कि भविष्य की हमारी पीढ़ियों के लिए एक ‘सस्टेनेबल एनवायरनमेंट’ का निर्माण करेगा। हम बड़े-बड़े पेड़ों की कटाई कर रहे हैं और महंगे दामों पर ऑक्सीजन छोड़ने वाले छोटे-छोटे पौधे घरों में रख रहे हैं। यह एक अजीब बात है। हम एक गलत परंपरा बना रहे हैं। हम बाहर के बड़े पेड़ों को काटकर घर में छोटे पौधे लगाकर पर्यावरण में हो रही क्षति की भरपाई नहीं कर सकते हैं।
बात में दम है। कटते पेड़-उजड़ते जंगल ने सवाल खड़े किए हैं। वन क्षेत्र से ही पर्यावरण को संतुलित करने में सहायता मिलती है। प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो पटना के निदेशक एवं पर्यावरण चिंतक दिनेश कुमार की माने तो इंसान पर्यावरण से अंतरक्रिया करता है, पर्यावरण इंसानों के लिए कितना आवश्यक है, इसे बखूबी समझने की आवश्यकता है। अगर मैं गौरैया की नजर से इंसानों को देखूं तो इंसान एक आइडेंटिटी क्राइसिस (पहचान के संकट) में जी रहा है। इंसान अपने आपको यह दिखाने में लगा हुआ है कि वह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। जबकि ऐसा है नहीं। प्रकृति से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं। इंसानों ने अपने आसपास एक कृत्रिम पर्यावरण बना दिया है। हमें प्रकृति से बिल्कुल भी छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। हमें नेचर ऑफ लॉ यानी प्रकृति के नियमों के हिसाब से ही चलना चाहिए।
वहीं पीपल नीम तुलसी अभियान, पटना के संस्थापक डॉ। धर्मेंद्र कुमार की माने तो वर्तमान परिदृश्य में देखे तो वातावरण के प्रति मनुष्यों की बौद्धिकता खत्म हो गई है। लोग आधुनिकता के पीछे तेजी से भाग रहे हैं। विकास के नाम पर जंगलों का सफाया किया जा रहा है। हम केवल हम में ही मशगूल हैं। जबकि मनुष्य को यह सोचना चाहिए कि पेड़, पक्षी पशु ये सभी हमारे परिवार के ही सदस्य हैं।
देखा जाए तो पूरी दुनिया धन के पीछे भाग रही है जबकि धन से कुछ भी होना जाना नहीं है। पर्यावरण आवरण को ठीक करने के लिए घर-घर में अलख जगाने की आवश्यकता है। तभी तो संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस कहते हैं, “प्रकृति के साथ शांति बनाना 21वीं सदी के लिए निर्धारित कार्य है, हर किसी के लिए, हर स्थल पर, इसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।” चूँकि विकास की बाध्यताऐं बढ़ी हैं, इसलिए इसी के अनुरूप जीव-जन्तु और प्रकृति को हरे और स्वस्थ भविष्य के अनुकूल बनाने की क्षमता की आवश्यकता है। सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखना संयुक्त राष्ट्र एजेंडा 2030 सतत विकास लक्ष्यों के मुख्य प्रयोजनों में से एक है। इसमें पर्यावरण के साथ साथ गौरैया का भी संरक्षण अहम है क्योंकि वह हमारे इको सिस्टम की हिस्सा है। नहीं तो चीन जैसा हाल हो जाएगा जब 1958 मेँ वहाँ के प्रशासक ने अनाज की बर्बादी के लिए गौरैया को दोषी करार देकर उसके खात्मे का फरमान जारी कर दिया था और देखते देखते गौरैया का पूरी तरह से सफाया कर दिया गया था। लेकिन अगले साल फिर फसल बर्बादी हुई तो पता चला कि गौरैया उसके लिए दोषी नहीं थी बल्कि फसल मेँ लगने वाले कीड़ों को खा कर मदद ही कर रही थी।
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