विलुप्ति के कगार पर मालवी ऊंट, बचाने की मुहिम शुरू

‘रेगिस्तान के जहाज’ ऊँटों खासकर भारत में स्थिति चिंताजनक है उनके संरक्षण के लिए उठाए जा रहे नए कदमों के दौर से गुजर रही है। पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जिसके चलते सरकार और अनुसंधान केंद्र इनके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं। इधर खबर…

‘रेगिस्तान के जहाज’ ऊँटों खासकर भारत में स्थिति चिंताजनक है उनके संरक्षण के लिए उठाए जा रहे नए कदमों के दौर से गुजर रही है। पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जिसके चलते सरकार और अनुसंधान केंद्र इनके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं। इधर खबर आई है कि भारत में ऊंटों की नौ नस्लों में शामिल दुर्लभ मालवी (सफेद) ऊंट विलुप्त होने के गंभीर खतरे का सामना कर रहा है। इस नस्ल के अब केवल 102 ऊंट ही शेष बचे हैं, जिसे बचाने के लिए राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र (एनआरसीसी) ने विशेष संरक्षण एवं प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया है। अधिकारियों ने 27 जुलाई को यह जानकारी मीडिया को दी।

वर्ष 2019 की पशुधन गणना के अनुसार, मालवी ऊंटों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है, जिसके कारण यह नस्ल संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी भी ऊंट की नस्ल में यदि प्रजनन योग्य मादा ऊंटों की संख्या 300 से कम रह जाती है, तो उसे विलुप्त होने के खतरे वाली नस्ल माना जाता है। मालवी के अलावा मेवाड़ी और मेवाती नस्ल भी इसी श्रेणी में आती हैं। इस संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र (एनआरसीसी) ने विशेष प्रजनन एवं संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया है। एनआरसीसी के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वेद प्रकाश ने कहा, ‘‘हमने तीन नर और नौ मादाओं सहित 12 मालवी ऊंट खरीदे हैं तथा उनकी संख्या बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया है।’’

उन्होंने कहा कि संस्थान इस नस्ल की आनुवंशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए शुद्ध प्रजनन तकनीक पर काम कर रहा है, ताकि इसकी संख्या बढ़ाई जा सके।मालवी ऊंट अपनी विशिष्ट सफेद रंगत के लिए जाना जाता है और इसे भारत की ऊंट नस्लों में सबसे छोटा माना जाता है। यह नस्ल दुग्ध उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। एक मादा मालवी ऊंट एक दुग्ध चक्र में लगभग चार से पांच किलोग्राम दूध देती है। परंपरागत रूप से इस नस्ल का उपयोग परिवहन और सामान ढोने के लिए किया जाता रहा है। यह मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के मंदसौर, नीमच, रतलाम और ग्वालियर जिलों के अलावा राजस्थान के कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां जिलों में पाई जाती है। अधिकारियों के अनुसार, बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों तथा ऊंटों की घटती उपयोगिता के कारण इस नस्ल की संख्या लगातार कम होती गई है।

डॉ. वेद प्रकाश ने कहा, संरक्षण और प्रजनन कार्यक्रम के साथ-साथ हम इस नस्ल की विशिष्ट विशेषताओं का अध्ययन भी कर रहे हैं तथा किसानों और पशुपालकों के बीच जागरूकता फैलाने का काम भी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर), करनाल की नेटवर्क परियोजना के तहत संचालित किया जा रहा है। इसके तहत पशुपालकों को इस नस्ल की उपयोगिता के बारे में जागरूक किया जा रहा है और इसके संरक्षण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार वैज्ञानिक प्रयासों और स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी से ही इस अनूठी रेगिस्तानी धरोहर को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है।

जनसंख्या और आंकड़े

कुल संख्या: 20वीं पशुधन गणना के अनुसार, भारत में कुल ऊँटों की संख्या घटकर लगभग 2.51 लाख रह गई है। भौगोलिक स्थिति: भारत के कुल ऊँटों का लगभग 85% से अधिक हिस्सा अकेले राजस्थान में पाया जाता है। इसके अलावा गुजरात, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी ऊँट पाए जाते हैं। राजस्थान सरकार ने 30 जून 2014 को ऊँट को अपना ‘राज्य पशु’ घोषित किया था।

नस्लों पर मंडराता खतरा

भारत में ऊँटों की कुल नौ प्रमुख नस्लों (जैसे बीकानेरी, जैसलमेरी, मारवाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, मालवी आदि) को मान्यता प्राप्त है। इनमें से कई नस्लें गंभीर संकट में हैं:

मालवी (सफेद) नस्ल: यह भारत की सबसे छोटी और सफेद रंग की दुर्लभ नस्ल है, जो मुख्य रूप से मध्य प्रदेश (मालवा क्षेत्र) और राजस्थान के कुछ जिलों में पाई जाती है। इनकी आबादी घटकर बेहद कम (लगभग 100 के आसपास) रह जाने के कारण यह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है।

संकटग्रस्त श्रेणियां: वैज्ञानिकों के अनुसार, जिन नस्लों में प्रजनन योग्य मादा ऊँटों की संख्या 300 से कम रह जाती है, उन्हें संकटग्रस्त माना जाता है। मालवी के अलावा मेवाड़ी और मेवाती नस्लें भी इसी खतरे का सामना कर रही हैं।

संख्या में गिरावट के प्रमुख कारण

यांत्रिकीकरण (Mechanization): कृषि और परिवहन में ट्रैक्टर और अन्य आधुनिक वाहनों के आने से पारंपरिक रूप से सामान ढोने और खेती के लिए ऊँटों की उपयोगिता कम हो गई है।

चरागाहों की कमी: चरागाह भूमि (Pasture lands) के लगातार सिकुड़ने और वनों के सीमित होने के कारण ऊँट पालकों को इन्हें चराने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

आर्थिक तंगी: ऊँट पालने की लागत बढ़ने और ऊँटों की कम कीमत मिलने के कारण पालकों ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी है।

संरक्षण और सुधार के लिए उठाए गए कदम

ऊँटों की घटती संख्या को रोकने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने कई बड़े कदम उठाए हैं:

राष्ट्रीय पशुधन मिशन (National Livestock Mission): भारत सरकार ने ऊँटों और गधों को इस मिशन के तहत शामिल किया है। इसके अंतर्गत ऊँट पालकों को बढ़ावा देने, उनके आवास, बीमा और प्रजनन सुधार (Genetic Improvement) के लिए वित्तीय सहायता व सब्सिडी दी जा रही है।

राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (NRCC): बीकानेर (राजस्थान) स्थित राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र लुप्त हो रही नस्लों (जैसे मालवी ऊँट) को बचाने के लिए विशेष वैज्ञानिक प्रजनन कार्यक्रम चला रहा है।

राजस्थान सरकार द्वारा ऊँट संरक्षण के लिए ‘ऊँट संरक्षण एवं विकास मिशन’ चलाया जा रहा है, जिसके तहत ऊँट के बच्चे के जन्म पर पालकों को आर्थिक सहायता दी जाती है। साथ ही, ऊँटनी के दूध के व्यावसायिक उपयोग और डेयरी को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि पालकों की आय बढ़ सके। कहें तो, आधुनिकीकरण के कारण ऊँटों के अस्तित्व पर संकट जरूर आया है, परंतु सरकारी नीतियों, बीमा योजनाओं और वैज्ञानिक संरक्षण के माध्यम से इनकी स्थिति को सुधारने के प्रयास तेजी से किए जा रहे हैं। (फोटो-साभार -अंतर्जाल )

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