गौरैया का असली घर खोह, दीवार के छेद

संजय कुमार/ गौरैया सदियों से इंसानों के सबसे करीब रहने वाला पक्षी रही है।  इन्हें अपने घोंसले के लिए इंसान के घरों के अंदर-बाहर, दीवारों के खोह (सुराख) और वेंटिलेटर जैसी जगहें सबसे ज्यादा पसंद आती हैं। गौरैया को यह जगह इसलिए पसंद आती है क्योंकि उसे सुरक्षा मिलती है। दीवारों के खोह या घरों…

संजय कुमार/ गौरैया सदियों से इंसानों के सबसे करीब रहने वाला पक्षी रही है।  इन्हें अपने घोंसले के लिए इंसान के घरों के अंदर-बाहर, दीवारों के खोह (सुराख) और वेंटिलेटर जैसी जगहें सबसे ज्यादा पसंद आती हैं। गौरैया को यह जगह इसलिए पसंद आती है क्योंकि उसे सुरक्षा मिलती है। दीवारों के खोह या घरों के कोने गौरैया को चील, बाज, बिल्ली और कौवों जैसे शिकारियों से बचाते हैं। ईंटों की दीवार में खोह इन्हें तेज धूप, भारी बारिश और कड़ाके की ठंड से सुरक्षित रखती हैं।

खोह, मौसम से बचाव करते हैं। 45 डिग्री की गर्मी, 5 डिग्री की सर्दी, बारिश यों कहे हर मौसम में गौरैया और उसके परिवार को बचाते हैं। खोह में अंधेरा होने से अंडे सेकने और चूजे पालने के लिए उपयुक्त जगह होता है। हजारों साल पहले गौरैया चट्टान के छेद में रहती थी। अब चट्टान की जगह ‘घर की दीवार’ ने ले ली। बाथरूम में लगे पाइप के खोह में तिनका रख घोंसला बना लेती है। यह सबसे सुरक्षित जगह होती है खिड़की से अंदर आती है और घर बसा लेती है।

गौरैया बहुत ही समझदार और खोजी स्वभाव की पक्षी होती है। वे घोंसला बनाने के लिये प्रकृति जगह को पसंद करती हैं। दीवारों के खोह और सुराख पुरानी या अधबनी दीवारों में छूटे हुए सुराख या पाइप के छेद, फूस  के घर उनकी पहली पसंद होते हैं। आवासीय संकट के बीच गौरैया ने बिजली के मीटर और बोर्ड के पीछे की जगह को चुनने लगी। अक्सर घरों के बाहर लगे केबल और बिजली के बक्से या कट-आउट के पीछे की खाली जगह में ये अपना घर बना लेती हैं। साथ ही वेंटिलेटर और एयर कंडीशनर के नीचे गैप एवं कमरों के वेंटिलेटर (रोशनदान) या विंडो एसी के ऊपर और पीछे बनी जगह इनके लिए एकदम सुरक्षित होती है। पुराने जमाने के कड़ियों वाले मकानों या शेड के नीचे जहां भी दो दीवारों का जोड़ होता है, वहां ये घोंसला बना लेती हैं। घर का कोई दरवाजा या खिड़की हमेशा खुली रहती है, तो गौरैया के कमरे के अंदर आकर दीवार पर टंगी फोटो फ्रेम या घड़ी के पीछे भी तिनके इकट्ठे करने लगती हैं और सृजन के लिये घोंसला बना लेती है।

आजकल आधुनिक  फ्लैट्स और पक्के मकानों में दीवारों के खोह या रोशनदान नहीं होते, जिसकी वजह से गौरैया की संख्या तेजी से घट रही है। अगर हम उन्हें अपने घर में आमंत्रित करना चाहते हैं, तो कृत्रिम  घोंसला बाजार में लकड़ी या गत्ते के बने-बनाए घोंसले  मिलते हैं। हम इन्हें अपने घर की बाहरी दीवार, बालकनी या छज्जे के नीचे ऐसी जगह लटका सकते हैं जहां हमलावर पक्षी और बिल्ली न पहुंच पाए।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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